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गोल

खेल: डाँडी या गोथा

हॉकी जैसे पुराने खेल 'डाँडी' या 'गोथा' के बारे में जानो।

अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 21 खोलो और 'झरोखे से' पढ़ो। हॉकी के बारे में पढ़ने के बाद अब किताब हॉकी जैसे ही एक अनोखे खेल के बारे में बताती है, जिसे लाखों बच्चे अपने गली-मुहल्लों में खेलते हैं। इस खेल का नाम है — 'डाँडी या गोथा'।

पृष्ठ 22 पर किताब बताती है कि यह भील-भिलाला बच्चों का खेल है। 'डाँडी' और 'गोथा' — दोनों शब्दों का अर्थ एक ही है: खेलने की हाथ-लकड़ी। यह खेल काफ़ी-कुछ हॉकी जैसा है। अंतर यह है कि हॉकी में गोल करने के लिए गोलपोस्ट होते हैं, पर इस खेल में गोलपोस्ट नहीं होते। दूसरा अंतर यह है कि इसकी गेंद हॉकी की गेंद से बहुत साधारण होती है — वह बाँस की बनी होती है।

खेल की सामग्री तीन चीज़ें हैं। पहली, बाँस के गुट्टे (गाँठ वाले मोटे टुकड़े) से बनी गेंद, जिसे 'दुईत' कहते हैं। दूसरी, गोथा — यानी बाँस की डंडियाँ, जो अंग्रेज़ी के 'L' अक्षर की तरह नीचे से मुड़ी होती हैं। तीसरी, राख — जिससे खेल के मैदान की सीमा बनाई जाती है और घेरे के भीतर एक छोटा वृत्त (गोला) बनाया जाता है।

पृष्ठ 23 पर एक विशेष बात है: यह खेल होली का त्योहार आने से कुछ दिन पहले से खेला जाता है। अंत में, जिस दिन होलिका जलाई जाती है, उस दिन ये दुईत और गोथे (गेंद और डंडे) आग में डाल दिए जाते हैं।

'डाँडी या गोथा' भील-भिलाला बच्चों का हॉकी जैसा खेल है, पर इसमें गोलपोस्ट नहीं होते; दोनों शब्दों का अर्थ है खेलने की हाथ-लकड़ी, गेंद बाँस के गुट्टे की होती है जिसे 'दुईत' कहते हैं, गोथा 'L' की तरह मुड़ी बाँस की डंडी है, मैदान राख से बनाया जाता है, और होलिका जलने के दिन गेंद-डंडे आग में डाल दिए जाते हैं।

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