गोल
ही, भी, तो
सीखो कि 'ही', 'भी' और 'तो' बात पर ज़ोर कैसे देते हैं।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 19 खोलो और 'बात पर बल देना' पढ़ो। वहाँ पाठ 'गोल' का एक वाक्य दो तरह से लिखा है। पहले में ध्यानचंद कहते हैं: मैंने तो अपना बदला ले ही लिया है। दूसरे में वही बात है, पर 'ही' नहीं है: मैंने तो अपना बदला ले लिया है।
दूसरे वाक्य में एक शब्द कम है — 'ही'। उस एक शब्द के न होने से अर्थ में थोड़ा अंतर आ जाता है। 'ही' वाले वाक्य में ज़्यादा ज़ोर है: ध्यानचंद पक्का कह रहे हैं कि बदला पूरा हो चुका है, अब इसमें कोई शक नहीं। 'ही' के बिना वाक्य सीधी-सादी सूचना जैसा लगता है।
अपनी बात पर बल (ज़ोर) देने के लिए हम कुछ विशेष शब्दों का प्रयोग करते हैं: 'ही', 'भी' और 'तो'। पाठ की शुरुआत में भी ये शब्द हैं: ध्यानचंद कहते हैं कि खेल में 'तो' यह सब चलता 'ही' है, और उनके दिनों में 'भी' यह सब चलता था।
हर शब्द का ज़ोर थोड़ा अलग होता है। 'मैं भी खेलूँगा' — यानी दूसरों के साथ-साथ मैं भी खेलूँगा। 'मैं ही खेलूँगा' — यानी केवल मैं खेलूँगा, और कोई नहीं। 'मैं तो खेलूँगा' — यानी कोई और खेले या न खेले, मैं ज़रूर खेलूँगा।
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