गोल
शब्द-युग्म और योजक चिह्न
शब्द-युग्म और योजक चिह्न के बारे में जानो।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 18 खोलो और 'शब्दों के जोड़े, विभिन्न प्रकार के' पढ़ो। पाठ 'गोल' में ध्यानचंद कहते हैं कि जैसे-जैसे उनके खेल में निखार आया, वैसे-वैसे उन्हें तरक्की भी मिलती गई। यहाँ 'जैसे-जैसे' और 'वैसे-वैसे' शब्दों के जोड़े हैं, जिनमें एक ही शब्द दो बार आया है।
ऐसे जोड़ों को 'शब्द-युग्म' कहते हैं ('युग्म' यानी जोड़ा)। शब्द-युग्म के दो शब्दों के बीच एक छोटी-सी रेखा (-) लगाई जाती है, जिसे 'योजक चिह्न' कहते हैं। 'योजक' का अर्थ है जोड़ने वाला — यह रेखा दो शब्दों को जोड़ती है। पाठ में और भी ऐसे जोड़े हैं, जैसे तिवारी जी उन्हें 'बार-बार' खेलने को कहते थे। 'धीरे-धीरे' भी ऐसा ही जोड़ा है।
पर हर शब्द-युग्म में एक ही शब्द नहीं होता। पाठ की शुरुआत में आता है कि खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक होती रहती है। 'धक्का-मुक्की' और 'नोंक-झोंक' भी शब्द-युग्म हैं, लेकिन इनके दोनों शब्द भिन्न-भिन्न (अलग-अलग) हैं, एक जैसे नहीं। 'खाना-पीना' भी ऐसा ही जोड़ा है।
तो शब्द-युग्म दो तरह के हुए: एक, जिनमें एक ही शब्द दो बार आता है (जैसे-जैसे, बार-बार); दूसरे, जिनमें दो अलग शब्द होते हैं (धक्का-मुक्की, नोंक-झोंक)। दोनों में बीच में योजक चिह्न लगता है।
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