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गोल

संस्मरण में 'मैं'

समझो कि संस्मरण में लेखक 'मैं' कहकर अपनी बात क्यों लिखता है।

अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 18 खोलो और 'संस्मरण की रचना' पढ़ो। पाठ 'गोल' एक संस्मरण है। 'संस्मरण' शब्द 'स्मरण' से बना है, जिसका अर्थ है याद करना। संस्मरण में लेखक अपने जीवन की बीती हुई सच्ची घटनाएँ याद करके लिखता है।

किताब पाठ का वह वाक्य दिखाती है जहाँ ध्यानचंद कहते हैं कि उन दिनों में 'मैं' पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करता था। यह पढ़कर ऐसा लगता है मानो लेखक हमसे — यानी पाठक से — बैठकर अपनी यादें बाँट रहा हो।

संस्मरण में लेखक 'मैं' बनकर बोलता है। पाठ 'गोल' में बार-बार ऐसे शब्द आते हैं: मैं, मुझे, मेरा, मैंने — जैसे, मुझे मैदान से बाहर ले जाया गया; मैंने छह गोल कर दिए। ये शब्द बताते हैं कि लेखक किसी और की नहीं, अपनी ही बात सुना रहा है। पाठ में 'मैं' खुद मेजर ध्यानचंद हैं।

संस्मरण बीते समय की बात होती है, इसलिए उसमें ऐसे शब्द आते हैं: 'उन दिनों', 'सन् 1933 की बात है'। और यह सच्ची घटना होती है — लेखक की अपनी आँखों देखी, अपने साथ बीती। कोई गढ़ी हुई (काल्पनिक) कहानी नहीं।

संस्मरण में लेखक 'मैं' बनकर पाठक से अपने जीवन की बीती हुई सच्ची यादें साझा करता है — जैसे पाठ 'गोल' में मेजर ध्यानचंद बताते हैं कि उन दिनों वे पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेलते थे।

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