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पहली बूँद

कविता: पहली बूँद

गोपालकृष्ण कौल की कविता 'पहली बूँद' पढ़ो।

अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 25 खोलो और पाठ 3 की कविता 'पहली बूँद' पढ़ो। कविता पृष्ठ 26 तक चलती है। इसे गोपालकृष्ण कौल ने लिखा है।

पहले मई-जून की गर्मी याद करो: तेज़ धूप, सूखी ज़मीन, मुरझाए पौधे, और सब बारिश का इंतज़ार कर रहे हैं। यह कविता उसी इंतज़ार के खत्म होने की है। 'पावस' का अर्थ है वर्षा ऋतु, और 'धरा' का अर्थ है धरती। कविता उस दिन की है जब पावस के पहले दिन पहली बूँद धरती पर आई।

बूँद के आते ही धरती से एक अंकुर फूट पड़ा। भीगे चने में से जैसे छोटा-सा सफ़ेद अंकुर निकलता है, वैसे ही बीज से नया पौधा निकलने लगा — मानो उसने नए जीवन की अँगड़ाई ली हो, जैसे कोई सोकर उठते समय बदन सीधा करता है।

धरती के अधर (होंठ) गरमी से सूखे थे। बहुत प्यास लगी हो और पानी मिले, तो जैसा लगता है — वैसे ही उन होंठों पर बूँद ऐसे गिरी जैसे अमृत गिरा हो। हरी दूब (घास), जो धरती के महीन रोओं जैसी लगती है, खुशी से पुलक उठी और मुसकाई।

फिर कवि आकाश की ओर देखता है। बादल ऐसे लगते हैं मानो सागर आकाश में उड़ रहा हो, और चमकती बिजलियाँ उसके सुनहरे पंख हों। बादल गरजते हैं तो लगता है वे नगाड़े बजाकर धरती की तरुणाई (जवानी) को जगा रहे हैं।

पृष्ठ 26 पर कवि कहता है कि नीला आकाश नीली आँखों जैसा है, और काले बादल उन आँखों की काली पुतलियों जैसे। करुणा से भरकर वे आँसू बहाते हैं — यानी बरसते हैं — और धरती की बहुत पुरानी प्यास (चिर-प्यास) बुझा देते हैं। तब बूढ़ी, सूखी धरती का मन फिर से शस्य-श्यामला — यानी हरी-भरी फसलों वाली — बनने को ललचा उठता है।

ध्यान दो: पूरी कविता में धरती, घास और बादल इंसानों की तरह अँगड़ाई लेते, मुसकाते, नगाड़े बजाते और आँसू बहाते हैं। प्रकृति को इंसान की तरह दिखाना मानवीकरण कहलाता है।

एक बूँद गिरी, और सूखी, बूढ़ी धरती फिर से जवान होने लगी।

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