पहली बूँद
कविता की तुलनाएँ
कविता में पहली बूँद और बादलों की सुंदर तुलनाएँ खोजो।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 25 खोलो और कविता 'पहली बूँद' फिर से पढ़ो। कवि चीज़ों के सीधे नाम कम लेता है; वह उन्हें किसी और चीज़ जैसा बताकर उनका चित्र बनाता है। पृष्ठ 27 की तालिका में ऐसे चार चित्र हैं, और हर एक का भावार्थ (असली भाव) पहचानना है।
'आसमान में उड़ता सागर' — सागर आकाश में नहीं उड़ता, पर पानी से भरे बादल उड़ते हैं। इसलिए उड़ता सागर यानी बादल। और इस उड़ते सागर पर बिजलियाँ ऐसे चमकती हैं मानो वे उसके सुनहरे (स्वर्णिम) पंख हों।
'बजते नगाड़े' — बादल नगाड़े बजाकर धरती को जगा रहे हैं। नगाड़े की गड़गड़ाहट जैसी आवाज़ बादलों के गरजने से आती है। इसलिए बजते नगाड़े यानी मेघ-गर्जना (बादलों का गरजना)।
पृष्ठ 26 पर कवि कहता है कि यह अंबर (आकाश) नीले नयनों (आँखों) जैसा है, और ये जलधर काली पुतलियों जैसे हैं। तो 'नीले नयनों-सा' है आकाश, और 'काली पुतली' हैं काले बादल। आँखों से आँसू बहते हैं, वैसे ही बादलों से बारिश।
और 'वसुंधरा की रोमावलि-सी' — वसुंधरा यानी धरती, और रोमावलि यानी शरीर के महीन रोओं की कतार। धरती पर उगी हरी दूब ऐसी ही लगती है। इसलिए रोमावलि-सी है हरी दूब।
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