हार की जीत
कहानी का अंत
कहानी का अंत पढ़ो और जानो कि शीर्षक 'हार की जीत' क्यों है।
यह कहानी आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 4 'हार की जीत' की है। अब हम कहानी का अंत पढ़ेंगे।
बाबा भारती चले गए, पर उनके शब्द खड्गसिंह के कानों में गूँजते रहे। वह सोचता रहा — बाबा के कैसे ऊँचे विचार हैं, कैसा पवित्र भाव है! उन्हें इस घोड़े से इतना प्रेम था, वे इसके बिना रह नहीं सकते थे, पर आज उनके चेहरे पर दुख की रेखा तक नहीं थी। उन्हें केवल यह चिंता थी कि कहीं लोग गरीबों पर विश्वास करना न छोड़ दें।
रात के अँधेरे में खड्गसिंह सुलतान की बाग (लगाम) पकड़े बाबा के मंदिर पहुँचा। चारों ओर सन्नाटा था, आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे। अस्तबल का फाटक खुला पड़ा था — अब बाबा को किसी चोरी का डर नहीं था। खड्गसिंह ने सुलतान को उसकी जगह पर बाँध दिया और फाटक बंद कर दिया। उस समय उसकी आँखों में पछतावे (पश्चाताप) के आँसू थे।
रात का चौथा पहर शुरू होते ही बाबा ने स्नान किया और आदत के अनुसार उनके पाँव अस्तबल की ओर चल पड़े, जैसे कोई सपने में चल रहा हो। फाटक पर पहुँचकर उन्हें याद आया कि घोड़ा तो अब है ही नहीं, और निराशा से उनके पाँव भारी हो गए। तभी घोड़े ने अपने स्वामी के पाँवों की आहट (चाप) पहचान ली और ज़ोर से हिनहिनाया!
बाबा दौड़कर अंदर गए और सुलतान के गले से लिपटकर ऐसे रोए, मानो कोई पिता बहुत दिनों से बिछड़े पुत्र से मिल रहा हो। वे बार-बार कहते थे — 'अब कोई गरीबों की सहायता से मुँह न मोड़ेगा।' बाहर निकलते समय उनके आँसू ठीक उसी जगह गिरे, जहाँ खड्गसिंह खड़ा होकर रोया था। इस तरह दोनों के आँसू उसी भूमि की मिट्टी पर आपस में मिल गए।
अब नाम की पहेली सुलझ गई। बाबा घोड़ा हार गए थे, पर उनके ऊँचे विचारों ने डाकू का मन बदल दिया — यही उनकी जीत थी। हार में से निकली जीत: 'हार की जीत'।
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