हार की जीत
अपाहिज का छल
पढ़ो कि एक अपाहिज के बहाने बाबा भारती के साथ क्या हुआ।
यह कहानी आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 4 'हार की जीत' की है। अब कहानी का वह हिस्सा आता है जहाँ सब कुछ बदल जाता है — कहानी का मोड़।
एक शाम बाबा भारती सुलतान पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। उनकी आँखों में चमक थी और वे मन में फूले न समा रहे थे। तभी एक ओर से आवाज़ आई — 'ओ बाबा, इस कंगले की सुनते जाना।' कंगला यानी बहुत गरीब। उस आवाज़ में करुणा (दया जगाने वाला दुख) थी। बाबा ने घोड़ा रोका तो देखा कि एक अपाहिज आदमी पेड़ की छाया में पड़ा कराह रहा है।
अपाहिज ने हाथ जोड़कर कहा कि वह बहुत दुखी है; उसे रामावाला जाना है, जो वहाँ से तीन मील दूर है; बाबा उसे घोड़े पर बैठा लें। बाबा ने पूछा कि वहाँ उसका कौन है, तो उसने कहा — 'मैं दुर्गादत्त वैद्य का सौतेला भाई हूँ।'
बाबा का दिल पिघल गया। वे घोड़े से उतर गए, अपाहिज को घोड़े पर बैठाया और खुद लगाम पकड़कर धीरे-धीरे पैदल चलने लगे। सहसा (अचानक) उन्हें एक झटका लगा और लगाम हाथ से छूट गई। उन्होंने देखा कि वह अपाहिज घोड़े की पीठ पर तनकर बैठा है और घोड़े को दौड़ाए लिए जा रहा है। वह अपाहिज नहीं, डाकू खड्गसिंह था! बाबा की दया का उसने छल (धोखा) से फ़ायदा उठाया था।
बाबा ने पूरे बल से पुकारा — 'ज़रा ठहर जाओ।' खड्गसिंह रुका और बोला कि अब वह घोड़ा नहीं देगा। बाबा ने कहा — यह घोड़ा अब तुम्हारा हो चुका है, मैं इसे वापस नहीं माँगूँगा। मेरी केवल एक प्रार्थना है: इस घटना को किसी के सामने प्रकट न करना।
खड्गसिंह ने पूछा कि इसमें उन्हें क्या डर है। बाबा बोले — अगर लोगों को इस घटना का पता चला, तो वे किसी गरीब पर विश्वास नहीं करेंगे। सोचो: जिस घोड़े के बिना वे रह नहीं सकते थे, उसके छिनते ही बाबा को अपनी नहीं, दूसरों की चिंता हुई।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.