हार की जीत
खड्गसिंह की धमकी
पढ़ो कि डाकू खड्गसिंह ने बाबा भारती को कौन-सी धमकी दी।
यह कहानी आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 4 'हार की जीत' की है। अब हम कहानी की अगली घटनाएँ क्रम से पढ़ेंगे।
उस इलाके में खड्गसिंह नाम का एक प्रसिद्ध डाकू था। लोग उसका नाम सुनते ही काँप जाते थे। धीरे-धीरे सुलतान की प्रशंसा उसके कानों तक भी पहुँची, और उसका मन उस घोड़े को देखने के लिए अधीर हो उठा। एक दिन दोपहर को वह बाबा भारती के पास आया और नमस्कार करके बैठ गया। उसने कहा कि सुलतान की चाह उसे यहाँ खींच लाई है।
बाबा उसे अस्तबल (घोड़े के रहने की जगह) में ले गए। बाबा ने घोड़ा घमंड से दिखाया, और खड्गसिंह ने उसे आश्चर्य से देखा। उसने सैकड़ों घोड़े देखे थे, पर ऐसा बाँका घोड़ा कभी नहीं देखा था। उसने मन में सोचा — ऐसा घोड़ा तो खड्गसिंह के पास होना चाहिए, साधु को इससे क्या लाभ? फिर उसने बालकों की तरह अधीर होकर कहा कि इसकी चाल न देखी तो क्या देखा।
बाबा भारती भी मनुष्य ही थे। अपनी चीज़ की प्रशंसा सुनने के लिए उनका मन भी अधीर हो गया। वे घोड़े को बाहर लाए और उस पर सवार हो गए। घोड़ा ऐसे दौड़ा जैसे हवा से बातें कर रहा हो। यह चाल देखकर खड्गसिंह के मन में जलन होने लगी। जाते-जाते उसने कहा — 'बाबाजी, मैं यह घोड़ा आपके पास न रहने दूँगा।'
यह सुनकर बाबा डर गए। अब उन्हें रात को नींद नहीं आती थी; वे सारी रात अस्तबल की रखवाली करते रहते। पर कई महीने (मास) बीत गए और खड्गसिंह नहीं आया। धीरे-धीरे बाबा कुछ असावधान हो गए और उस डर को सपने के डर की तरह झूठा समझने लगे।
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