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हार की जीत

कहानी: हार की जीत

सुदर्शन की कहानी 'हार की जीत' शुरू करो और बाबा भारती और उनके घोड़े सुलतान से मिलो।

यह कहानी आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 4 'हार की जीत' की है, जिसे सुदर्शन ने लिखा है। नाम ही एक पहेली है: कोई या तो हारता है या जीतता है — फिर 'हार की जीत' कैसे? कहानी पढ़ते हुए इसका उत्तर ढूँढना। इस पाठ में हम कहानी का आरंभ पढ़ेंगे।

कहानी में तीन ही पात्र हैं: बाबा भारती, डाकू खड्गसिंह, और बाबा का घोड़ा सुलतान — जो एक शब्द भी नहीं बोलता, पर पूरी कहानी उसी के चारों ओर घूमती है।

बाबा भारती एक साधु थे। उन्होंने अपना रुपया, माल-असबाब, ज़मीन — सब कुछ छोड़ दिया था। उन्हें नगर का जीवन भी अच्छा नहीं लगता था। वे गाँव के बाहर एक छोटे-से मंदिर में रहते थे और भगवान का भजन करते थे।

पर उनके पास एक चीज़ थी जिससे वे बहुत प्रेम करते थे — उनका घोड़ा। वह बहुत सुंदर और बहुत बलवान था; पूरे इलाके में उसके जोड़ का दूसरा घोड़ा नहीं था। कहानी कहती है कि जैसे माँ को अपने बेटे को और किसान को अपने लहलहाते खेत को देखकर आनंद आता है, वैसा ही आनंद बाबा को सुलतान को देखकर आता था। माँ बेटे को पालती है, किसान खेत को सींचता है — जिसे हमने मेहनत से पाला हो, उसे देखकर सबसे ज़्यादा खुशी होती है।

भजन से जो भी समय बचता, वह सारा बाबा घोड़े को दे देते। वे अपने हाथ से उसका खरहरा करते — खरहरा लोहे की एक चौकोर कंघी है, जिससे घोड़े का शरीर साफ़ किया जाता है — और खुद उसे दाना खिलाते। उन्हें ऐसा लगने लगा था कि वे सुलतान के बिना रह ही नहीं सकेंगे।

बाबा सुलतान की चाल पर 'लट्टू' थे, यानी उस पर मोहित थे। वे कहते थे कि सुलतान ऐसे चलता है जैसे मोर बादलों की घटा देखकर नाच रहा हो — मोर का वह नाच सबसे सुंदर माना जाता है। हर शाम (संध्या को) जब तक वे सुलतान पर चढ़कर आठ-दस मील का चक्कर न लगा लेते, उन्हें चैन नहीं आता था।

जिस साधु ने सब कुछ छोड़ दिया था, वह एक घोड़े को नहीं छोड़ पाया।

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