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रहीम के दोहे

सुई और तलवार

रहीम का सुई और तलवार वाला दोहा पढ़ो और उसकी सीख समझो।

अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 45 खोलो और पाठ 5 'रहीम के दोहे' का पहला दोहा पढ़ो — वह दोहा जिसमें सुई और तलवार की बात है। दोहा दो पंक्तियों की छोटी कविता होती है, जिसमें कोई बड़ी सीख छिपी होती है।

इस दोहे में कवि रहीम कहते हैं: किसी बड़ी चीज़ को देखकर छोटी चीज़ को फेंक नहीं देना चाहिए। क्यों? क्योंकि जहाँ सुई काम आती है, वहाँ तलवार कुछ नहीं कर सकती। तलवार सुई से बहुत बड़ी है, फिर भी कपड़ा सिलने का काम वह नहीं कर सकती।

किताब के पृष्ठ 49 पर इस दोहे का भाव और खोलकर समझाया गया है: न कोई बड़ा है, न कोई छोटा। चाहे हाथी हो या चींटी, तलवार हो या सुई — सबके अपने-अपने काम हैं और सबकी अपनी-अपनी उपयोगिता और महत्त्व है। सिलाई का काम सुई से ही हो सकता है, तलवार से नहीं। सुई जोड़ने का काम करती है, जबकि तलवार काटने का।

इसलिए इस दोहे की सीख है: हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्त्व होता है। कोई वस्तु हो या व्यक्ति, छोटा हो या बड़ा — हमें सबका सम्मान करना चाहिए।

सुई और तलवार वाले दोहे में रहीम सिखाते हैं कि बड़ी चीज़ देखकर छोटी को नहीं फेंकना चाहिए, क्योंकि हर छोटी-बड़ी चीज़ का अपना महत्त्व है — सुई जोड़ती है, तलवार काटती है — इसलिए सबका सम्मान करना चाहिए।

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