रहीम के दोहे
प्रेम का धागा
प्रेम के धागे वाला दोहा पढ़ो और उसका अर्थ समझो।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 45 खोलो और पाठ 5 'रहीम के दोहे' का तीसरा दोहा पढ़ो — वह दोहा जिसमें प्रेम को एक धागे जैसा बताया गया है।
इस दोहे में रहीम कहते हैं: प्रेम का धागा झटके से (छिटकाकर) मत तोड़ो। कोई धागा एक बार टूट जाए, तो वह फिर पहले जैसा नहीं जुड़ता। और अगर उसे जोड़ भी दो, तो बीच में एक गाँठ पड़ जाती है।
यह बात प्रेम और रिश्तों पर भी लागू होती है। अगर गुस्से में या जल्दबाज़ी में किसी से रिश्ता तोड़ दिया जाए, तो वह फिर आसानी से नहीं जुड़ता। और अगर जुड़ भी जाए, तो मन में कोई न कोई खटास — एक 'गाँठ' — रह जाती है।
इसलिए इस दोहे की सीख है: प्रेम और रिश्तों को सहेजकर (सँभालकर) रखना चाहिए, उन्हें झटके से नहीं तोड़ना चाहिए।
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