रहीम के दोहे
विपत्ति और सच्चे मित्र
विपत्ति और सच्चे मित्र के बारे में रहीम का दोहा समझो।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 45 खोलो और पाठ 5 'रहीम के दोहे' के दो दोहे पढ़ो: पाँचवाँ दोहा, जिसमें विपदा (मुसीबत) के थोड़े दिनों की बात है, और सातवाँ यानी आखिरी दोहा, जिसमें संपत्ति, सगे और सच्चे मित्र (मीत) की बात है। दोनों दोहे एक ही बात सिखाते हैं।
पाँचवें दोहे में रहीम कहते हैं: अगर मुसीबत थोड़े दिन की हो, तो वह भी भली (अच्छी) है। क्यों? क्योंकि मुसीबत के समय ही पता चलता है कि इस संसार में कौन हमारा हित चाहता है (हितैषी है) और कौन नहीं।
सातवें दोहे में रहीम कहते हैं: जब हमारे पास संपत्ति (धन) होती है, तो बहुत-से लोग तरह-तरह से हमारे सगे बन जाते हैं। पर सच्चे मित्र वही हैं जो विपत्ति की कसौटी पर खरे उतरें। कसौटी वह पत्थर है जिस पर सोने को घिसकर परखा जाता है कि वह असली है या नहीं। यानी मुसीबत ही वह 'पत्थर' है जिस पर मित्रों की परख होती है।
तो दोनों दोहों की सीख है: सच्चे मित्र विपदा में भी हमारा साथ देते हैं। सुख में तो सब साथ होते हैं, पर दुख में जो साथ रहे, वही सच्चा मित्र है।
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