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रहीम के दोहे

जीभ का दोहा

जीभ के बारे में रहीम का दोहा पढ़ो और समझो।

अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 45 खोलो और पाठ 5 'रहीम के दोहे' का छठा दोहा पढ़ो — वह दोहा जिसमें जीभ (जिह्वा) की बात है।

इस दोहे में रहीम जीभ को 'बावरी' कहते हैं — यानी पगली, जो बिना सोचे कुछ भी बोल देती है। वे कहते हैं कि यह बावरी जीभ स्वर्ग और पाताल की — यानी ऊटपटाँग, बढ़ा-चढ़ाकर — बातें कह देती है, और फिर खुद तो चुपचाप मुँह के भीतर चली जाती है।

पर उसकी कही बातों की सज़ा किसे मिलती है? सिर (कपाल) को! दोहा कहता है कि जूते सिर को खाने पड़ते हैं। यानी गलत बात जीभ बोलती है, पर मार और अपमान पूरे व्यक्ति को सहना पड़ता है।

इसलिए इस दोहे की सीख है: हमें सोच-समझकर बोलना चाहिए। बिना सोचे कही गई एक बात भी हमें बड़ी मुसीबत में डाल सकती है।

रहीम कहते हैं कि बावरी जीभ ऊटपटाँग बातें कहकर खुद भीतर चली जाती है, पर जूते सिर को खाने पड़ते हैं — इसलिए सोच-समझकर बोलना चाहिए।

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