मेरी माँ
माँ का ऋण
जानो कि बिस्मिल अपनी माँ के ऋण के बारे में क्या कहते हैं।
यह पाठ आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 6 'मेरी माँ' से है। पाठ के अंत में बिस्मिल सीधे अपनी माँ से बात करते हैं, जैसे कोई चिट्ठी लिख रहे हों। वे माँ को 'जन्मदात्री जननी' (जन्म देने वाली माँ) कहकर पुकारते हैं।
बिस्मिल कहते हैं: माँ, इस जीवन में तो मुझे तुम्हारा ऋण (कर्ज़) उतारने की कोशिश करने का अवसर भी नहीं मिला। अगर मैं अनेक जन्मों में भी सारी ज़िंदगी कोशिश करूँ, तब भी तुम्हारे ऋण से उऋण नहीं हो सकता। ('ऋण' यानी कर्ज़, और 'उऋण' होना यानी कर्ज़ पूरा चुका देना।) तुम्हारी दया से ही मैं देश-सेवा में लग सका; मैंने जो कुछ सीखा, उसका श्रेय भी तुम्हें ही है। बड़े से बड़े संकट में भी तुमने मुझे अधीर नहीं होने दिया।
फिर वे अपनी इच्छा बताते हैं: मुझे इस संसार में किसी भोग-विलास या ऐश्वर्य (धन-दौलत के सुख) की इच्छा नहीं है। मेरी केवल एक इच्छा है — कि एक बार श्रद्धा से तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपना जीवन सफल बना लेता। पर उन्हें लगता है कि यह इच्छा पूरी नहीं होगी, और माँ को उनकी मृत्यु की दुखभरी खबर सुनाई जाएगी। (बिस्मिल ये बातें जेल में लिख रहे थे, जहाँ उन्हें फाँसी की सज़ा हो चुकी थी।)
बिस्मिल को विश्वास है कि माँ यह समझकर धैर्य रखेंगी कि उनका पुत्र भारत माता की सेवा में अपना जीवन बलिदान कर गया और अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा। वे कहते हैं कि जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जाएगा, तो उसमें माँ का नाम भी उज्ज्वल अक्षरों में लिखा जाएगा। अंत में वे माँ से आशीर्वाद माँगते हैं कि आखिरी समय में भी उनका हृदय विचलित न हो (न डगमगाए)।
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