मेरी माँ
आत्मकथा
जानो कि आत्मकथा क्या होती है।
आपकी किताब 'मल्हार' का पाठ 6 'मेरी माँ' रामप्रसाद 'बिस्मिल' की आत्मकथा का एक अंश है। किताब के पृष्ठ 57 पर बताया गया है: आत्मकथा यानी अपनी कथा — अपने जीवन की कहानी, जो कोई व्यक्ति खुद लिखता है। दुनिया में बहुत-से लोग अपनी आत्मकथा लिखते हैं — कभी अपने लिए, तो कभी दूसरों के पढ़ने के लिए।
आत्मकथा में लेखक 'मैं' बनकर अपने बारे में लिखता है। इसलिए उसमें 'मैं', 'मेरी', 'मुझे', 'मैंने' जैसे शब्द बार-बार आते हैं। पाठ का नाम ही देखो — 'मेरी माँ'। 'मेरी' बताता है कि लेखक अपनी माँ की बात कर रहा है।
पाठ में ऐसी बहुत-सी पंक्तियाँ हैं जिनसे पता चलता है कि लेखक अपने बारे में कह रहा है। जैसे बिस्मिल बताते हैं कि लखनऊ कांग्रेस जाने की उनकी बड़ी इच्छा थी, या कि उन्होंने वकालतनामे पर हस्ताक्षर नहीं किए — और ये बातें वे 'मेरी इच्छा थी', 'मैंने हस्ताक्षर नहीं किए' जैसे शब्दों में, अपने मुँह से कहते हैं।
अब पाठ से पहले, पृष्ठ 51 पर दिया गया परिचय देखो। वहाँ लिखा है कि 'बिस्मिल' छोटी आयु से अंग्रेज़ों से लड़ते रहे, उन्होंने जेल में आत्मकथा लिखी। यह हिस्सा किसी और ने बिस्मिल के बारे में लिखा है — इसलिए इसमें 'मैं' नहीं, बल्कि 'बिस्मिल', 'उन्होंने', 'वे' जैसे शब्द हैं। यह आत्मकथा नहीं, उनके बारे में परिचय है।
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