जलाते चलो
सा, सी, से
सीखो कि 'सा', 'सी' और 'से' का सही प्रयोग कैसे होता है।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 69 खोलो और 'सा/सी/से का प्रयोग' पढ़ो। कविता 'जलाते चलो' में दो शब्दों के नीचे रेखा खिंची है: 'निशा-सी' और 'स्वर्ण-सी'।
'निशा-सी' का अर्थ है रात जैसी — कविता कहती है कि दिन में ही दुनिया पर रात जैसी अमावस घिर रही है। 'स्वर्ण-सी' का अर्थ है सोने जैसी — पहली बार जली लौ आज भी सोने जैसी जल रही है। कविता में 'पूर्णिमा-सी' भी आया है — यानी पूर्णिमा जैसी।
इन शब्दों में 'सी' समानता दिखाने के लिए आया है — यानी बताने के लिए कि कोई चीज़ किसी दूसरी चीज़ जैसी है। किताब एक नियम बताती है: जब 'सा/सी/से' समानता दिखाने के लिए आते हैं, तो उनसे पहले योजक चिह्न (-) लगाया जाता है। जैसे — फूल-सा, निशा-सी, मोती-से।
'सा', 'सी' या 'से' — कौन-सा लगेगा, यह उस शब्द पर निर्भर है जिसके बारे में बात हो रही है। 'चेहरा' (पुल्लिंग) के लिए 'सा': चाँद-सा चेहरा। 'लौ' या 'आवाज़' (स्त्रीलिंग) के लिए 'सी': स्वर्ण-सी लौ, कोयल-सी आवाज़। 'दाँत' (बहुवचन) के लिए 'से': मोती-से दाँत।
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