जलाते चलो
चंद्रमा की कलाएँ
अमावस्या, पूर्णिमा और चंद्रमा की कलाओं के बारे में जानो।
अपनी किताब 'मल्हार' का पृष्ठ 70 खोलो और 'अमावस्या और पूर्णिमा' पढ़ो। कविता 'जलाते चलो' में कवि कहता है कि विज्ञान अमावस को पूर्णिमा जैसा बना सकता है। आओ, जानें कि आकाश में चंद्रमा हर रात एक जैसा क्यों नहीं दिखता।
चंद्रमा पृथ्वी की परिक्रमा करता है (उसके चारों ओर घूमता है), और पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती है। चंद्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं होता। वह सूर्य के प्रकाश से ही चमकता है।
चंद्रमा हर रात एक-सा नहीं दिखता — वह घटता-बढ़ता दिखाई देता है। इन अलग-अलग रूपों को चंद्रमा की 'कलाएँ' कहते हैं। चंद्रमा की कला धीरे-धीरे बढ़ती है, और पूर्णिमा की रात चंद्रमा पूरा दिखता है। इसके बाद कला धीरे-धीरे घटती है, और अमावस्या की रात चाँद दिखाई ही नहीं देता।
कलाओं के घटने के दिनों को 'कृष्ण पक्ष' कहते हैं। 'कृष्ण' शब्द का एक अर्थ है काला — इन दिनों रातें अँधेरी होती जाती हैं। कलाओं के बढ़ने के दिनों को 'शुक्ल पक्ष' कहते हैं। 'शुक्ल' शब्द का एक अर्थ है उजला।
पृष्ठ 71 पर चाँद के रूपों का एक गोल घेरा बना है। उसमें सबसे ऊपर पूर्णिमा है; वहाँ से घटते चाँद की ओर तीर कृष्ण पक्ष का है, जो नीचे अमावस्या तक जाता है; और अमावस्या से बढ़ते चाँद की ओर तीर शुक्ल पक्ष का है, जो फिर पूर्णिमा तक आता है।
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