सत्रिया और बिहू नृत्य
सत्रिया में बदलाव
जानो कि समय के साथ सत्रिया नृत्य में क्या बदलाव आए।
यह हिस्सा आपकी किताब 'मल्हार' के पाठ 8 'सत्रिया और बिहू नृत्य' का है। सत्रिया नृत्य असम का एक नृत्य है, जिसकी उत्पत्ति सत्रों (मठों) में हुई।
एक दिन एंजेला और अनु ने देखा कि एलेसेंड्रा एक वैष्णव मठ के सभागार (बड़े हॉल) में नाच रहे युवा साधुओं का फ़िल्मांकन कर रही हैं। एंजेला हैरान होकर सोचने लगी — क्या सत्रिया नृत्य सिर्फ़ लड़कों और पुरुषों के लिए है? दोनों लड़कियाँ मन ही मन चाहती थीं कि काश वे भी इन साधुओं की तरह गा सकतीं, नाच सकतीं और नकली (छद्म) युद्ध लड़ सकतीं!
माँ ने एंजेला को इसका जवाब दिया। बीसवीं शताब्दी के मध्य में कुछ साधु मठों से बाहर आए और पुरुषों और महिलाओं — दोनों को सत्रिया नृत्य सिखाने लगे। शुरू में ऐसे साधुओं को मठों से निकाल दिया गया।
लेकिन धीरे-धीरे समय बदला। आज के (आधुनिक) दौर में महिला सत्रिया कलाकारों का मंच पर नृत्य करना आम बात हो गई है। उसी रात माँ महिला सत्रिया नृत्यांगनाओं का फ़िल्मांकन करने वाली थीं।
तो समय के साथ सत्रिया नृत्य की परंपरा में यह बदलाव आया: पहले यह नृत्य मठों के भीतर साधु करते थे, और अब महिलाएँ भी इसे मंच पर करती हैं।
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