माँ, कह एक कहानी
कहानी का आरंभ
मैथिलीशरण गुप्त की कविता 'माँ, कह एक कहानी' शुरू कीजिए, जहाँ एक बेटा माँ से कहानी सुनाने को कहता है।
सोचिए: आपको बचपन में कहानी कौन सुनाता था? अक्सर नानी या दादी! और पुरानी कहानियाँ कैसे शुरू होती थीं? "एक था राजा, एक थी रानी ..." यह याद रखिए, कविता में काम आएगा।
'मल्हार' का पहला पाठ मैथिलीशरण गुप्त की कविता 'माँ, कह एक कहानी' है। पूरी कविता माँ और बेटे की बातचीत है। इसलिए पढ़ते समय ध्यान रखिए कि कौन-सी पंक्ति किसने कही।
बेटा ज़िद करता है: "माँ, कह एक कहानी।" माँ हँसकर छेड़ती है: "बेटा, समझ लिया क्या तूने मुझको अपनी नानी?" यानी कहानी सुनाना तो नानी का काम है, माँ का नहीं!
बेटा हार नहीं मानता: "कहती है मुझसे यह चेटी, तू मेरी नानी की बेटी!" (चेटी = सेविका, दासी।) उसका तर्क सीधा है: माँ भी तो नानी की बेटी है, तो कहानी सुनाना उसका भी काम हुआ!
फिर वह पूछता है: "कह माँ, कह, लेटी ही लेटी, राजा था या रानी?" (जैसे पुरानी कहानियाँ शुरू होती थीं!) यह पंक्ति कविता में बार-बार लौटती है।
आख़िर माँ मान जाती है: "तू है हठी मानधन मेरे, सुन, उपवन में बड़े सबेरे, तात भ्रमण करते थे तेरे, जहाँ, सुरभि मनमानी।"
- हठी = ज़िद्दी
- उपवन = बगीचा (जहाँ हम सुबह की सैर करने जाते हैं)
- तात = पिता
- सुरभि = सुगंध, खुशबू
अब कहानी का दृश्य खुलता है: "वर्ण वर्ण के फूल खिले थे, झलमल कर हिम-बिंदु झिले थे, हलके झोंके हिले-मिले थे, लहराता था पानी।" यानी रंग-बिरंगे फूल, चमकती ओस की बूँदें, हलकी हवा और लहराता पानी।
ध्यान दीजिए: माँ जो कहती है, बेटा उसे दोहराकर पूछता है: "लहराता था पानी? हाँ, माँ, यही कहानी।" यही दोहराव कविता की सबसे बड़ी खूबी है। इससे माँ-बेटे की बातचीत जीवित लगती है।
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