मीरा के पद
स्वामिभक्त सुमुख
चित्रकथा 'स्वामिभक्त सुमुख' पढ़िए।
पाठ के बाद 'पढ़ने के लिए' एक चित्रकथा: 'स्वामिभक्त सुमुख'। (स्वामिभक्त = अपने स्वामी के प्रति निष्ठा रखने वाला।) कहानी बहुत अच्छी है!
कहानी शुरू: पुराने समय में महिंसक राज्य में राजा सकुल का शासन था। चित्रकूट पर्वत की एक गुफा में हंसों का बड़ा झुंड रहता था। कुछ हंसों ने नगर के पास एक सुंदर कमल-सरोवर देखा: मानुसिय।
हंसों के राजा मरालदेव को संदेह था: "हमें चित्रकूट का अपना क्षेत्र नहीं छोड़ना चाहिए।" मंत्री सुमुख भी सहमत था: "जिस जगह का उपयोग मनुष्य करते हों, वहाँ जाना हमारे लिए सुरक्षित नहीं।" पर टोली ने ज़िद की, और राजा मान गया।
वही हुआ जिसका डर था: वहाँ आखेटक (शिकारी) का जाल था, और राजा का पाँव फँस गया! पर राजा चिल्लाया नहीं: "अगर मैं अभी चिल्लाया, तो मेरे साथी बिना कुछ चुगे ही उड़ जाएँगे। बेचारे, कितनी लंबी उड़ान भरकर आए हैं!" जब सबका पेट भर गया, तब उसने संकट का संकेत दिया। यह है एक समझदार, दयालु नेता।
सब उड़ गए, सिवाय सुमुख के। राजा ने कहा: तुम भी जाओ। सुमुख बोला: "मैं आपको इस स्थिति में छोड़ने की अपेक्षा आपके साथ मर जाना अधिक पसंद करूँगा। संकट की इस घड़ी में आपके साथ रहना मेरा परम कर्तव्य है।"
आखेटक आया और चकित रह गया: एक हंस फँसा है, दूसरा मुक्त होकर भी बैठा है! सुमुख बोला: "ये मेरे राजा होने के साथ प्रिय मित्र भी हैं।" फिर: "महाराज को छोड़ दो और बदले में मुझे पकड़ लो। मैं इनके समान ही बड़ा और मोटा-ताज़ा हूँ" (यानी तुम्हें कोई हानि नहीं होगी)।
"इस प्रकार सौम्यता से किंतु दृढ़तापूर्वक बातचीत करके सुमुख आखेटक का हृदय परिवर्तन करने में सफल हो गया।" (सौम्यता = नरमी; दृढ़ता = पक्कापन।) आखेटक ने कोमलता से पाँव छुड़ाया और घाव धोए। वह चाहता तो उन्हें बेचकर इनाम पा सकता था, पर उसने ऐसा नहीं किया।
अंत: हंसों के कहने पर आखेटक उन्हें राजा सकुल के पास ले गया। राजा ने हंसों को सोने के आसन पर बिठाया, शहद और मिसरी दी, और आखेटक को घर, रथ, सोना और एक लाख की आय दी। मरालदेव बोले: यह सब "मेरे सेनापति सुमुख की समझदारी और निष्ठा" से हुआ।
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