मीरा के पद
कवयित्री से परिचय
कवयित्री मीरा के जीवन के बारे में जानिए।
पृष्ठ 129 पर 'कवयित्री से परिचय'। ध्यान दीजिए: 'कवि' नहीं, 'कवयित्री', क्योंकि रचना करने वाली एक स्त्री हैं।
"आपने जो रचना अभी पढ़ी है, उसे आज से लगभग 500 वर्ष पहले रचा गया था।" यह पूरी किताब की सबसे पुरानी रचना है, और फिर भी उसकी भाषा आज भी समझ में आ जाती है!
"इसे हिंदी की महान कवयित्री, कृष्ण भक्त और संत मीरा ने रचा था।" तीन पहचान, एक साथ।
"यह माना जाता है कि मीरा बचपन से ही कृष्ण की भक्ति में मगन रहती थीं।"
उनके जीवन की सबसे बड़ी बात: "एक राजकुमारी होते हुए भी उन्होंने संतों का जीवन चुना और महलों को त्यागकर तीर्थों की यात्राएँ करने लगीं।"
| उनके पास क्या था | उन्होंने क्या चुना |
|---|---|
| महल, सुविधाएँ, सम्मान | संतों का सादा, कठिन जीवन |
| राजघराने का जीवन | तीर्थों की यात्राएँ |
| मंदिरों में भजन और सत्संग |
जो आसानी से मिला था, उसे छोड़ना (त्याग) ही उनकी भक्ति का प्रमाण है।
सत्संग = अच्छे लोगों के साथ बैठकर भक्ति की बातें करना। और: "उनके गाए हुए भजन लोग आज भी श्रद्धा और प्रेम से गाते, पढ़ते और सुनते-सुनाते हैं।" 500 साल बाद भी जीवित! किसी रचना की इससे बड़ी सफलता क्या होगी?
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