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मीरा के पद

बरसे बदरिया सावन की

मीरा का दूसरा पद 'बरसे बदरिया सावन की' पढ़िए।

दूसरा पद:

"बरसे बदरिया सावन की, सावन की मन भावन की। सावन में उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन की॥ उमड़ घुमड़ चहुँ दिश से आया, दामिन दमकै झर लावन की। नन्हीं नन्हीं बूँदन मेहा बरसे, शीतल पवन सोहावन की॥ मीरा के प्रभु गिरधरनागर, आनंद मंगल गावन की॥"

यह वर्षा ऋतु का पद है। वर्षा के तीन महीने: आषाढ़, सावन, भादो। सावन (श्रावण) आषाढ़ के बाद और भाद्रपद के पहले आता है। हरियाली, ठंडक, बारिश: इसलिए सावन 'मन भावन' (मन को अच्छा लगने वाला) है।

पंक्तिशब्दअर्थ
बरसे बदरिया सावन की, सावन की मन भावन कीबदरिया = बदली, बादलसावन के मन को भाने वाले बादल बरस रहे हैं
सावन में उमग्यो मेरो मनवा, भनक सुनी हरि आवन कीउमग्यो = उमंग से भर गया; भनक = हलकी-सी आहट; हरि = श्रीकृष्ण; आवन = आनामेरा मन उमंग से भर गया, क्योंकि मैंने हरि के आने की भनक सुनी

यही पद की कुंजी है! मीरा का मन इसलिए नहीं उमगा कि बारिश हो रही है, बल्कि इसलिए कि उन्हें कृष्ण के आने की आहट मिली। बादलों की गरज और बूँदों की रिमझिम उन्हें कृष्ण के क़दमों की आवाज़ लगती है।

पंक्तिशब्दअर्थ
उमड़ घुमड़ चहुँ दिश से आया, दामिन दमकै झर लावन कीचहुँ दिश = चारों दिशाएँ; दामिन = बिजली; दमकै = चमकती है; झर = झड़ीचारों ओर से बादल उमड़-घुमड़ कर आए, बिजली चमकी, झड़ी लग गई
नन्हीं नन्हीं बूँदन मेहा बरसे, शीतल पवन सोहावन कीमेहा = मेघ, वर्षा; शीतल = ठंडी; सोहावन = सुहावनीनन्हीं-नन्हीं बूँदें बरसीं, ठंडी हवा सुहानी लगी

अंतिम पंक्ति: "मीरा के प्रभु गिरधरनागर, आनंद मंगल गावन की॥" (गिरधर = पर्वत को धारण करने वाले; कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत उँगली पर उठाया था।) मीरा ख़ुशी के मंगल गीत गा रही हैं।

पूरा पद प्रसन्नता से भरा है; कहीं भी दुख या उदासी नहीं।

सावन की बदली बरस रही है और मीरा का मन उमगा है — क्योंकि उन्होंने हरि के आने की भनक सुन ली है।

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