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मीरा के पद

बसो मेरे नैनन में नंदलाल

जानिए कि पद क्या होता है और मीरा का पद 'बसो मेरे नैनन में नंदलाल' पढ़िए।

'मल्हार' का दसवाँ और अंतिम पाठ मीरा के दो पद हैं। पद = भक्ति-कविता की एक छोटी रचना, जो गाई जाती है। पूरी किताब में पहली बार ऐसी पुरानी रचना आई है! कोई भी कविता हो, पहले उसे पूरा पढ़िए, फिर अर्थ पर जाइए।

पहला पद:

"बसो मेरे नैनन में नंदलाल। मोहनि मूरति साँवरि सूरति, नैना बने विशाल॥ अधर सुधा रस मुरली राजति, उर वैजंती माल॥ क्षुद्र घंटिका कटितट सोभित, नूपुर शब्द रसाल॥ मीरा के प्रभु संतन सुखदाई, भक्त वछल गोपाल॥"

पहली पंक्ति एक विनती है: "बसो मेरे नैनन में नंदलाल।"

  • नैनन = नयनों (आँखों) में
  • नंदलाल = नंद (नंद बाबा) के लाल (पुत्र), यानी श्रीकृष्ण

मीरा कहती हैं: हे कृष्ण, मेरी आँखों में बस जाओ। वे कृष्ण के सिवा कुछ सोचना ही नहीं चाहतीं।

अब वर्णन, और वह ऊपर से नीचे चलता है:

पंक्तिशब्दअर्थ
मोहनि मूरति साँवरि सूरति, नैना बने विशालसाँवरि = साँवलीमन मोहने वाली मूरत, साँवली सूरत, बड़ी-बड़ी आँखें
अधर सुधा रस मुरली राजति, उर वैजंती मालअधर = होंठ; सुधा = अमृत; राजति = सजती है; उर = सीनाहोंठों पर मीठी धुन वाली बाँसुरी, सीने पर वैजयंती माला
क्षुद्र घंटिका कटितट सोभित, नूपुर शब्द रसालक्षुद्र = छोटी; कटितट = कमर; नूपुर = घुँघरू; रसाल = मीठाकमर पर छोटी घंटियाँ सजी हैं, पैरों के घुँघरू मीठी आवाज़ करते हैं

क्रम देखिए: मूरत → आँखें → होंठ → सीना → कमर → पैर। मीरा कृष्ण को सिर से पैर तक देखती हैं, जैसे कैमरा धीरे-धीरे नीचे उतरे! (आपने पाठ 7 'वर्षा-बहार' में भी ऐसा क्रम देखा था।)

अंतिम पंक्ति: "मीरा के प्रभु संतन सुखदाई, भक्त वछल गोपाल॥" हे मीरा के प्रभु! तुम संतों को सुख देने वाले हो, और भक्तों से स्नेह करने वाले (भक्त वत्सल) गोपाल हो। इस पद का मुख्य विषय है: प्रेम और भक्ति।

मीरा श्रीकृष्ण से विनती करती हैं कि वे उनकी आँखों में बस जाएँ — और फिर उन्हें सिर से पैर तक देखती हैं।

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