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चिड़िया

पक्षियों की प्रवास यात्राएँ

पक्षियों की लंबी प्रवास यात्राओं के बारे में पढ़िए।

पृष्ठ 126 पर 'झरोखे से' में 'पक्षी-जगत' (राष्ट्रीय पुस्तक न्यास, दिल्ली) से अंश: 'पक्षियों की प्रवास यात्राएँ'। कविता कहती थी: पक्षी 'जहाँ चाहते, जाते हैं'। यह अंश बताता है कि वे कहाँ जाते हैं, और कितनी कठिनाई से। (प्रवास = अपना स्थान छोड़कर कुछ समय दूसरी जगह रहना।)

कबकहाँ से कहाँ
शरद और शुरू जाड़ों मेंएशिया, यूरोप, अमरीका के उत्तरी भागों से गरम देशों में
वसंत और गरमियों मेंवापस उत्तर में

सबसे आश्चर्य की बात: वे "समय के इतने पक्के होते हैं कि इनके आने-जाने के एक-एक दिन की ठीक गणना की जा सकती है।" हाँ, प्रतिकूल (उलटे, ख़राब) मौसम में कभी देर हो जाए, तो बात दूसरी है।

भारत में यह आना-जाना बहुत ज़्यादा होता है। क्यों? जो पक्षी ऊँचे पहाड़ों पर गरमियाँ बिताते हैं, वे जाड़ों में निचली पहाड़ियों, तराई या मैदानों में आ जाते हैं। और भारत में "गंगा के क्षेत्र के बराबर में ही विशाल हिमालय है": ऊँचा पहाड़ और बड़ा मैदान पास-पास!

पर यात्रा आसान नहीं। इन "छोटे-छोटे वीर यात्रियों" के कष्ट:

  • जंगल, मैदान और समुद्र के ऊपर से उड़ना
  • भयंकर तूफ़ान, जिनमें वे रास्ता भटक जाते हैं
  • और एक कष्ट मनुष्य का बनाया: "रात को नगर का तीव्र प्रकाश इन्हें भटका देता है।" हमारी रोशनी उनका रास्ता बिगाड़ देती है!

उड़ने के ढंग:

  • कुछ पक्षी रुक-रुककर यात्रा करते हैं, ताकि थकान न हो
  • कुछ बिना रुके बहुत लंबी यात्राएँ कर लेते हैं
  • पक्षी प्रायः दल बनाकर उड़ते हैं; हर दल में एक ही प्रकार के पक्षी
  • सारस और हंस आकाश में 'V' की आकृति में उड़ते हैं, और तुरंत ध्यान खींच लेते हैं
पक्षी समय के इतने पक्के हैं कि उनके आने-जाने के दिन गिने जा सकते हैं — पर रात का शहरी प्रकाश उन्हें भटका देता है।

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