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तीन बुद्धिमान

राजा के दरबार में

भाइयों के साथ राजा के दरबार में चलिए और देखिए कि वहाँ क्या होता है।

भाइयों ने घुड़सवार से कहा: "हम अपनी आँखों और बुद्धि से काम लेना जानते हैं। जल्दी उस दिशा में घोड़ा दौड़ाओ, वहाँ तुम्हारा ऊँट मिल जाएगा।"

पर वह नहीं माना: "नहीं! मेरा ऊँट तुम्हारे पास है, और तुम्हें ही उसे लौटाना पड़ेगा।" भाइयों ने चिंता से कहा, "हमने तो उसे देखा तक नहीं।" पर वह एक न सुना।

उसने तलवार निकाली, ज़ोर से घुमाई और तीनों भाइयों को अपने आगे-आगे चलने का आदेश दिया। वह उन्हें सीधे अपने देश के राजा के भवन ले गया, सुरक्षा कर्मियों को सौंपा, और खुद राजा के पास गया।

उसने राजा को बताया: "मैं अपने रेवड़ (पशुओं के झुंड) पहाड़ों पर ले जा रहा था। मेरी पत्नी मेरे छोटे बेटे के साथ एक बड़े ऊँट पर पीछे आ रही थी। किसी कारण उनका ऊँट पीछे रह गया और वे रास्ता भटक गए।"

"उन्हें ढूँढ़ते हुए मुझे तीन पैदल लोग मिले। मुझे पूरा विश्वास है कि उन्होंने मेरा ऊँट चुराया है और मेरी पत्नी और बेटे को मार डाला है!"

राजा ने पूछा: "तुम ऐसा क्यों समझते हो?" घुड़सवार का तर्क: "क्योंकि मैंने उनसे एक शब्द भी नहीं कहा था, फिर भी उन्होंने बता दिया कि ऊँट बहुत बड़ा था, एक आँख से नहीं देखता था, और उस पर महिला बच्चे के साथ सवार थी!"

यह तर्क सुनने में मज़बूत लगता है, और राजा भी पहले इसी से सहमत हो जाता है। पर इसमें एक भूल है: घुड़सवार ने सोचा ही नहीं कि बिना देखे जानने का दूसरा तरीका भी हो सकता है: ध्यान से देखना और सोचना (अवलोकन)।

घुड़सवार का तर्क यह था कि इतना ठीक-ठीक जानना ही चोरी का प्रमाण है — और राजा पहले इसी से सहमत हुआ।

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