तीन बुद्धिमान
पेटी की परीक्षा
पढ़िए कि राजा भाइयों की बुद्धि को एक बंद पेटी से कैसे परखता है।
राजा ने पहले घुड़सवार की बात मान ली: "तुम्हारे बताए बिना उन्होंने ऊँट के बारे में सब कुछ बता दिया, तो ज़रूर उन्होंने ही चुराया होगा। उन चोरों को यहाँ लाओ!"
राजा ने धमकाया: "चोरो! फ़ौरन बताओ, ऊँट कहाँ छिपाया?" भाई बोले: "हम चोर नहीं हैं। हमने इसका ऊँट कभी नहीं देखा।"
फिर भाइयों ने वह बात कही जो पूरे पाठ की कुंजी है: "महाराज, इसमें आश्चर्य की कोई बात नहीं! बचपन से हमें आदत है कि हम कुछ भी अपनी नज़र से नहीं चूकने देते। हमने अपने आसपास को पैनी दृष्टि से देखने और बुद्धि से सोचने में बहुत समय लगाया है। इसीलिए ऊँट को देखे बिना बता दिया।"
राजा हँसा: "बिना देखे इतना जानना संभव है?" "हाँ, संभव है।" "तो ठीक है, हम अभी तुम्हारी परीक्षा लेंगे।"
राजा ने मंत्री के कान में कुछ फुसफुसाया (बहुत धीरे कहा)। मंत्री बाहर गया और दो सेवकों के साथ लौटा, जो एक बहुत बड़ी पेटी लाए। उन्होंने उसे बहुत सावधानी से द्वार के पास रखा और एक ओर हट गए।
यहीं असली बात है: "तीनों भाई दूर खड़े देखते रहे। उन्होंने ध्यान से देखा कि पेटी कहाँ से और कैसे लाई गई, और किस ढंग से रखी गई।" उन्होंने पेटी को नहीं, पेटी लाने के ढंग को देखा!
"तो चोरो, बताओ, पेटी में क्या है?"
- बड़ा भाई: "उसमें कोई छोटी-सी गोल चीज़ है।"
- मझला: "उसमें अनार है।"
- छोटा: "हाँ, और वह अभी कच्चा है।"
पेटी खुली, और उसमें निकला कच्चा अनार! राजा के आश्चर्य की कोई सीमा न रही।
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