पानी रे पानी
पाल के किनारे रखा इतिहास
अनुपम मिश्र के एक और लेख में तालाबों की पाल के इतिहास के बारे में पढ़िए।
पृष्ठ 53 पर 'झरोखे से' में अनुपम मिश्र के एक और लेख का अंश है: 'पाल के किनारे रखा इतिहास'। पाल = तालाब के किनारे बनी मेड़।
लेख एक वाक्य से शुरू होता है जो अंत में लौटेगा: "अच्छे-अच्छे काम करते जाना," राजा ने कूड़न किसान से कहा था।
"कूड़न, बुढ़ान, सरमन और कौंराई थे चार भाई। चारों सुबह जल्दी खेत पर काम करने जाते। दोपहर को कूड़न की बेटी पोटली में खाना लेकर आती।"
एक दिन बेटी को रास्ते में एक नुकीले पत्थर से ठोकर लगी। ग़ुस्से में उसने अपनी दाँती (हँसिया) से उसे उखाड़ना चाहा, पर दाँती पत्थर पर पड़ते ही लोहे से सोने में बदल गई! वह पत्थर था पारस: जिसे छूकर लोहा सोना बन जाता है।
चारों भाइयों की साँस अटक गई। पर कूड़न ने सोचा: देर-सबेर यह बात राजा तक पहुँचेगी ही, और तब पारस छिन जाएगा। तो क्यों न खुद जाकर राजा को सब बता दें?
और कहानी का असली मोड़: "राजा न पारस लेता है, न सोना। सब कुछ कूड़न को लौटाते हुए कहता है, 'जाओ, इससे अच्छे-अच्छे काम करते जाना, तालाब बनाते जाना।'" लेखक कहता है: फिर जो हुआ, वह लोहे को नहीं, समाज को पारस से छूने का क़िस्सा बन गया!
"यह कहानी सच्ची है या नहीं, मालूम नहीं।" पर देश के मध्य भाग के पाटन क्षेत्र में चार बहुत बड़े तालाब आज भी हैं, चारों इन्हीं भाइयों के नाम पर:
- बूढ़ा सागर
- मझगवाँ में सरमन सागर
- कुआँग्राम में कौंराई सागर
- कुंडम गाँव में कुंडम सागर
1907 में गजेटियर के लिए घूम रहे एक अंग्रेज़ ने भी यह क़िस्सा सुना और तालाब देखे थे।
लेखक का निष्कर्ष: "इतिहास ने सरमन, बुढ़ान, कौंराई और कूड़न को याद नहीं रखा, लेकिन इन्होंने तालाब बनाए और इतिहास को उनके किनारे पर रख दिया।" उनका इतिहास किताबों में नहीं, तालाब की पाल पर रखा है!
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