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पानी रे पानी

विश्वेश्वरैया

आर के मूर्ति की रचना से महान इंजीनियर विश्वेश्वरैया के बारे में जानिए।

पृष्ठ 55 पर 'पढ़ने के लिए': आर. के. मूर्ति की रचना 'विश्वेश्वरैया' (अनुवाद: सुमन जैन)। यह भी पानी से ही शुरू होती है!

"आकाश में अँधेरा छाया था ... फिर मूसलाधार वर्षा होने लगी। कुछ ही देर में गड्ढे और नालियाँ पानी से भर गईं।" छह साल का विश्वेश्वरैया घर के बरामदे में खड़ा यह दृश्य देख रहा था।

पास की नाली का पानी उमड़-घुमड़ रहा था, उसमें भँवर उठ रहे थे। वह झरने जैसा बन गया था, और एक बहुत बड़े पत्थर को बहा ले जा रहा था: पानी की शक्ति का प्रदर्शन!

उसने हवा और सूरज की शक्ति भी देखी थी। सब मिलकर प्रकृति की असीम शक्ति दिखा रहे थे। छोटा-सा लड़का बुदबुदाया: "प्रकृति शक्ति है। मुझे प्रकृति के बारे में सब कुछ जानना चाहिए।"

फिर उसी वर्षा में उसने ताड़पत्र की छतरी लिए खड़ी एक आकृति देखी: उनकी नौकरानी। फटे कपड़े, कमज़ोर, भूखी, झोंपड़ी में रहने वाली; उसके बच्चे कभी स्कूल नहीं जाते थे। विश्वेश्वरैया ने सोचा: "वह इतनी ग़रीब क्यों है?"

एक ही दिन, दो सवाल: प्रकृति की शक्ति कहाँ से, और ग़रीबी क्यों? उन्होंने गंभीरता से दोनों के कारण जानने की कोशिश की। बड़ों और शिक्षकों से पूछते रहते: ऊर्जा के स्रोत कौन-से हैं? इस ऊर्जा को पकड़कर काम में कैसे लाएँ? और इतने लोग ग़रीब क्यों हैं?

बातजानकारी
पूरा नाममोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया
जन्म15 सितंबर 1861, मुद्देनाहल्ली, मैसूर (अब कर्नाटक)
14 साल की उम्रपिता की मृत्यु

माँ ने पूछा कि मामा पर बोझ क्यों बनना चाहते हो, तो बोले: "अम्मा, मैं अपनी ज़रूरतों के लिए खुद कमाऊँगा। बच्चों को ट्यूशन पढ़ा दूँगा।" हल ढूँढ़ने की यह आदत जीवन-भर बढ़ती रही। उनका संदेश था: पहले जानो, फिर करो।

छह साल का लड़का दो प्रश्न पूछता है — प्रकृति की शक्ति कहाँ से, और ग़रीबी क्यों — और 'पहले जानो, फिर करो' उसका संदेश बनता है।

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