नहीं होना बीमार
अस्पताल की पहली यात्रा
स्वयं प्रकाश की कहानी 'नहीं होना बीमार' शुरू कीजिए और बच्चे की अस्पताल की पहली यात्रा पढ़िए।
'मल्हार' का पाँचवाँ पाठ स्वयं प्रकाश की कहानी 'नहीं होना बीमार' है। कहानी एक बच्चा खुद सुना रहा है ('मैं'), इसलिए हम सब कुछ उसकी आँखों से देखते हैं।
"एक दिन नानीजी मुझे साथ लेकर हमारे पड़ोसी सुधाकर काका को देखने गईं, जो बीमार थे और अस्पताल में भर्ती थे। अस्पताल जाने का यह मेरा पहला मौक़ा था।"
पहली बार देखी जगह का बहुत ध्यान से वर्णन: "एक बड़े वार्ड में कई एक जैसे पलंग लाइन से लगे थे। सब पर सफ़ेद चादर और लाल कंबल। सफ़ेद दीवारें, ऊँची छत, खिड़कियों पर हरे परदे, और फ़र्श एकदम चमकता हुआ।"
"अस्पताल का माहौल मुझे बहुत अच्छा लगा। खिड़कियों के पास हरे पेड़ झूम रहे थे। न ट्रैफ़िक का शोर, न धूल, न मच्छर-मक्खी ... बस लोगों की धीमी-धीमी गुनगुन। बाक़ी एकदम शांति।"
सफ़ेद कपड़ों में एक नर्स आई, नानीजी को देखकर सिर हिलाया और काका को दवा दी। नानीजी काका के लिए साबूदाने की खीर बनाकर लाई थीं। नर्स से पूछकर, उसके जाने के बाद, उन्होंने चम्मच से धीरे-धीरे काका को खीर खिलाई। "काका ने बहुत स्वाद लेकर खीर खाई।" (अस्पताल में घर से आया खाना बहुत अच्छा लगता है!)
अब बच्चे के मन की बात: "क्या ठाठ हैं बीमारों के भी! साफ़-सुथरे बिस्तर पर लेटे रहो और साबूदाने की खीर खाते रहो! काश, सुधाकर काका की जगह मैं होता! मैं कब बीमार पड़ूँगा?"
यही वह भूल है जिस पर पूरी कहानी टिकी है। बच्चे ने केवल वह देखा जो अच्छा लग रहा था (साफ़ बिस्तर, शांति, खीर), वह नहीं जो बीमारी में सचमुच होता है (दर्द, कमज़ोरी)। और यह भूल उसे कुछ ही दिनों में बहुत महँगी पड़ने वाली है!
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