पानी रे पानी
छिपे ख़ज़ाने की भूल
जानिए कि लोगों ने छिपे ख़ज़ाने को भूलकर कौन-सी गलती की।
अब वह भूल, जिसने सब बिगाड़ा: "एक दौर ऐसा भी आया जब हम इस छिपे ख़ज़ाने का महत्व भूल गए, और ज़मीन के लालच में हमने अपने तालाबों को कचरे से पाटकर, भरकर समतल बना दिया।" (पाटना = भरकर बराबर कर देना।)
"देखते-ही-देखते इन पर कहीं मकान, कहीं बाज़ार, स्टेडियम और सिनेमा खड़े हो गए।"
ये सब काम की चीज़ें हैं, पर बनीं उस जगह पर जो धरती की गुल्लक में पानी डालती थी! गुल्लक का मुँह बंद कर दो, तो बचत रुक जाती है।
"इस बड़ी ग़लती की सज़ा अब हम सबको मिल रही है। गर्मी में हमारे नल सूख जाते हैं, और बरसात में हमारी बस्तियाँ डूबने लगती हैं।"
समझिए कैसे: मान लीजिए शहर में पाँच तालाब थे, और हमने तीन पाट दिए। बारिश तो उतनी ही होगी! पानी को भरने की जगह नहीं मिली, तो वह घरों में भरेगा: बाढ़। और ज़मीन में रिसा भी नहीं, तो गर्मी में नल सूखेंगे: अकाल। एक भूल, दो मुसीबतें!
लेखक का उपाय सीधा है: अकाल और बाढ़ से बचना है, तो आस-पास के जलस्रोतों, तालाबों और नदियों की रखवाली अच्छे ढंग से करनी होगी।
पूरे लेख का सार: "जल-चक्र ठीक से समझें, जब बरसात हो तो उसे थाम लें, अपना भूजल भंडार सुरक्षित रखें, अपनी गुल्लक भरते रहें।" वरना "हम पानी के चक्कर में फँसते चले जाएँगे।" ध्यान दीजिए: जल-चक्र प्रकृति का नियम है; पानी का चक्कर वह मुसीबत है जो हमने खुद बनाई!
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