पानी रे पानी
धरती की गुल्लक
जानिए कि लेखक धरती को पानी की गुल्लक क्यों कहते हैं।
अब लेखक दोनों बातें जोड़ता है: "पानी का बेहद कम हो जाना और बेहद ज़्यादा हो जाना, यानी अकाल और बाढ़, एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।"
हम अकाल और बाढ़ को दो अलग आफ़तें समझते हैं। पर लेखक कहता है कि दोनों की जड़ एक है: हमने वर्षा का पानी सँभाला नहीं। "अगर हम इन्हें ठीक से समझ लें और सँभाल लें, तो कई समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है।"
अब एक सुंदर उदाहरण: "चलो, थोड़ी देर पानी का चक्कर भूलकर याद करें अपनी गुल्लक को।"
"जब भी कोई हमें पैसा देता है, हम खुश होकर झट से उसे गुल्लक में डाल देते हैं। ₹1, ₹2, ₹5, सिक्के, छोटे-बड़े नोट, सब धीरे-धीरे जमा होते जाते हैं। फिर जब ज़रूरत पड़ती है, तो इसी बचत का उपयोग कर लेते हैं।"
"हमारी यह धरती भी इसी तरह की खूब बड़ी गुल्लक है।" बरसात में प्रकृति इसमें खूब पानी बरसाती है। रुपयों से भी कई गुना कीमती इस वर्षा को हमें इस बड़ी गुल्लक में जमा कर लेना चाहिए।
गुल्लक में पानी डालता कौन है? गाँव-शहर के छोटे-बड़े तालाब और झीलें। इनमें जमा पानी धीरे-धीरे रिसकर, छनकर ज़मीन के नीचे छिपे जल-भंडार में मिल जाता है।
इससे हमारा भूजल (ज़मीन के नीचे का पानी) भंडार भरता जाता है। यह ख़ज़ाना हमें दिखता नहीं, पर बरसात बीतने के बाद पूरे साल हम इसी से घर, खेत और स्कूल के लिए पानी निकालते हैं। (हैंडपंप और बोरवेल इसी छिपे पानी को ऊपर खींचते हैं!)
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.