नहीं होना बीमार
लंबा और भूखा दिन
देखिए कि बीमार बनकर बच्चे का दिन कैसे बीता।
दोनों चले गए, और बच्चा नींद में गुडुप हो गया। आँख खुली तो उसे बड़ी तेज़ इच्छा हुई कि अभी बाहर निकलकर अपनी गली की चहल-पहल देखे।
वह सोचता है: "देखूँ, चंदूभाई ड्राइक्लीनर क्या कर रहे हैं? तेजराम की दुकान पर कितने ग्राहक बैठे हैं? महेश घी सेंटर ने मलाई का भगोना आँच पर चढ़ाया या नहीं? और टेलीफ़ोन के तारों पर कितनी चिड़ियाँ बैठी हैं?"
पर: "मजबूरी थी। चाहे जितनी ऊब हो, लेटे ही रहना था।" यही बहाने की सज़ा है: जो देखना है, वह बाहर है, और वह अपनी ही बनाई क़ैद में है!
"कुछ देर स्कूल की, दोस्तों की बातें सोचता रहा ... फिर लेटे-लेटे पीठ दुखने लगी तो उठकर बैठ गया। पर बाहर ज़रा आहट होते ही फिर लेट गया।" बीमार बने रहना भी मेहनत का काम है!
नानाजी फिर आए: "अब कैसा है सिरदर्द?" "ठीक है।" फिर भी एक पुड़िया और खिला गए!
"अचानक मुझे भूख लगी।" फल या खीर की उम्मीद तो सुबह ही ख़त्म हो चुकी थी, क्योंकि नानाजी कह चुके थे: "तबियत ढीली हो तो सबसे अच्छा उपाय है भूखे रहना। इससे सारे विकार (शरीर की ख़राबियाँ) निकल जाएँगे।"
और पहली बार पछतावा: "क्या मुसीबत है! आख़िर कब तक कोई पड़ा रह सकता है? इससे तो स्कूल चला जाता तो ठीक रहता। सज़ा मिलती तो मिल जाती। कितना मज़ा आता जब रिसेस में ठेले पर नमक-मिर्च लगे अमरूद खाते, कटर-कटर!"
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