नहीं होना बीमार
सारे विकार निकल गए
जानिए कि कहानी के अंत में बच्चे ने क्या सीखा।
भूख के कारण ठीक से नींद भी नहीं आ रही थी। आँख ज़रा लगती, तो खाने की चीज़ें दिखतीं: गरमागरम खस्ता कचौड़ी, मावे की बर्फ़ी, बेसन की चिक्की, गोलगप्पे, और सबसे ऊपर साबूदाने की खीर!
फिर वह प्रश्न जो हर बच्चे के मन में आता है: "खीर सिर्फ़ उपवास और बीमारी में ही क्यों बनती है? जैसे गुझिया सिर्फ़ होली-दिवाली और पंजीरी सिर्फ़ पूर्णिमा पर? क्या ये चीज़ें जब मन हो तब नहीं बन सकतीं? कोई मना करता है?" (आप क्या सोचते हैं? शायद कभी-कभी मिलने से ही ये चीज़ें ख़ास लगती हैं!)
"हे भगवान! यह तो अच्छी-ख़ासी बोरियत हो गई! क्या शाम को भी बाहर जाने देंगे? सारे बच्चे आँगन में खेल रहे होंगे और मैं बिस्तर में पड़ा झख मार रहा हूँगा। अक्लमंद! और बनो बीमार!" अब वह खुद पर ही हँस रहा है!
मुन्नू स्कूल से आ गया, सब खाना खाने बैठे। "मुन्नू एक बार भी मुझे देखने नहीं आया!" बच्चा कुढ़ता है: "किसी ने पूछा तक नहीं कि तू क्या खाएगा! पूछते तो मैं खीर ही तो माँगता, कोई ताजमहल तो नहीं! पर नहीं, भूखे रहो, इससे सारे विकार निकल जाएँगे!"
फिर रसोई की ख़ुशबू: "दाल-चावल! अरहर की दाल में हींग-जीरे का बघार, ऊपर से बारीक कटा हरा धनिया और आधा चम्मच देसी घी, और नीबू भी निचोड़ा होगा। थोड़ा-सा इस बीमार को भी दे दे कोई!"
"जब रहा नहीं गया तो रजाई फेंककर खड़ा हो गया। दबे पाँव दरवाज़े तक गया और चुपके से झाँका। हाँ, दाल-चावल, तली हरी मिर्च ... और मुन्नू आम चूस रहा था! आम, इस मौसम में! ज़रूर बंबई वाले चाचाजी ने भेजे होंगे!"
"मैं जलन, ग़ुस्से और कुढ़न में पाँव पटकता वापस बिस्तर में आ गया। उस पूरे दिन मुझे भूखे पेट ही रहना पड़ा। सारे विकार निकल गए। इसके बाद मैंने स्कूल से छुट्टी मारने के लिए बीमारी का बहाना कभी नहीं बनाया।"
"सारे विकार निकल गए" में व्यंग्य (मज़ाक़ भरा उलटा अर्थ) है। उसे कोई रोग था ही नहीं, तो विकार कहाँ से निकलते? पर बहाने बनाने की आदत ज़रूर निकल गई!
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