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गिरिधर कविराय की कुंडलिया

बिना बिचारे जो करै

जानिए कि कुंडलिया क्या होती है और गिरिधर कविराय की कुंडलिया 'बिना बिचारे जो करै' पढ़िए।

'मल्हार' का छठा पाठ गिरिधर कविराय की दो कुंडलियाँ हैं। कुंडलिया छह पंक्तियों का एक छंद (कविता का रूप) है, जिसकी एक ख़ास बनावट है। उसे आगे देखेंगे।

पहली कुंडलिया:

"बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय। काम बिगारे आपनो जग में होत हँसाय॥ जग में होत हँसाय चित्त में चैन न पावै। खान पान सन्मान राग रंग मनहिं न भावै॥ कह गिरिधर कविराय दुःख कछु टरत न टारे। खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे॥"

पहली दो पंक्तियाँ: जो बिना सोचे-समझे काम करता है, वह बाद में पछताता है। वह अपना (आपनो) ही काम बिगाड़ लेता है, और दुनिया में उसकी हँसी (हँसाय) होती है।

अपने जीवन से सोचिए: होमवर्क का पता था, पर सोचा नहीं, प्लान नहीं किया। सुबह 6 बजे बस है और आप 5:30 तक सोते रहे! न नहाना, न नाश्ता, न होमवर्क। फिर क्लास में डाँट पड़ी और साथी हँसने लगे।

बीच की दो पंक्तियाँ: दुनिया में हँसी होने पर चित्त (मन) में चैन (शांति) नहीं मिलता। "खान पान सन्मान राग रंग मनहिं न भावै": अच्छा खाना-पीना, सम्मान, राग-रंग (गाना, मनोरंजन), कुछ भी अच्छा नहीं लगता (न भावै)। जिसका मन बेचैन हो, उसे सुख की चीज़ें भी सुख नहीं देतीं।

आख़िरी दो पंक्तियाँ: "कह गिरिधर कविराय दुःख कछु टरत न टारे।" गिरिधर कविराय कहते हैं: यह दुख टालने से भी नहीं टलता। जितना भूलना चाहो, उतना याद आता है!

"खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे॥" (जिय = मन; खटकना = चुभते रहना।) बिना सोचे किया काम मन में हमेशा चुभता रहता है। यही सार है: बिना सोचे किया काम केवल बाहर नुक़सान नहीं करता, वह भीतर बैठकर बहुत समय तक चुभता रहता है।

बिना सोचे किया काम पछतावा, हँसी और बेचैनी लाता है — और मन में सदा खटकता रहता है।

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