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गिरिधर कविराय की कुंडलिया

बीती ताहि बिसारि दे

दूसरी कुंडलिया 'बीती ताहि बिसारि दे' पढ़िए और उसकी सीख समझिए।

दूसरी कुंडलिया:

"बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ। जो बनि आवै सहज में ताही में चित देइ॥ ताही में चित देइ बात जोई बनि आवै। दुर्जन हँसै न कोइ चित्त में खता न पावै॥ कह गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती। आगे को सुख होइ समुझि बीती सो बीती॥"

पहली पंक्ति: "बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ।" जो बीत गया, उसे भुला दो, और आगे का ध्यान रखो। बार-बार पुरानी ग़लती या दुख याद करके परेशान मत हो; उससे सीखो और आगे बढ़ो।

दूसरी पंक्ति: "जो बनि आवै सहज में ताही में चित देइ।" जो काम सहज (स्वाभाविक रूप से, बिना ज़्यादा कठिनाई के) बन सके, उसी में मन लगाओ।

ध्यान दीजिए: इसका अर्थ आलस नहीं है! अगली ही पंक्ति कहती है 'चित देइ', यानी मन लगाओ। अर्थ है: जो आपके बस में है और स्वाभाविक रूप से हो सकता है, उस पर ध्यान दो; असंभव के पीछे मन मत लगाओ। जिस काम में आपका मन लगता है, उसमें आप अच्छा भी करते हैं।

बीच की पंक्तियाँ: "ताही में चित देइ बात जोई बनि आवै। दुर्जन हँसै न कोइ चित्त में खता न पावै॥" (दुर्जन = बुरा व्यक्ति; खता = दोष, ग़लती।) ऐसे काम करो कि कोई बुरा व्यक्ति हँस न सके, और मन में कोई अपराधबोध न रहे।

यह दो बातें कहती है: बाहर लोगों की हँसी से बचना, और भीतर मन के दोष से बचना।

आख़िरी पंक्तियाँ: "कह गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती। आगे को सुख होइ समुझि बीती सो बीती॥" (परतीती = विश्वास।) अपने मन को यह विश्वास करना सिखाओ कि जो बीत गया, वह बीत गया। तभी आगे सुख मिलेगा।

बीती सो बीती — जो बीत गया उसे भुलाकर आगे देखो, और जो सहज में बन आए उसी में मन लगाओ।

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