गिरिधर कविराय की कुंडलिया
कवि से परिचय
कवि गिरिधर कविराय के बारे में जानिए।
पृष्ठ 74 पर 'कवि से परिचय'। अठारहवीं सदी में जन्मे गिरिधर कविराय को उनकी लोकप्रचलित (लोगों के बीच चली आ रही) कुंडलियों के लिए याद किया जाता है।
उनकी रचनाओं में बहुत-से नीतिपरक पद हैं, यानी जो सही ढंग से जीना सिखाएँ। बिलकुल कबीर और रहीम के नीति वाले दोहों की तरह!
उदाहरण वही दो जो आपने अभी पढ़े: "बिना बिचारे जो करै सो पाछे पछिताय" और "बीती ताहि बिसारि दे आगे की सुधि लेइ"।
ध्यान देने वाली बात: "उनकी कविताएँ लोगों में इतनी प्रसिद्ध हैं कि लोग उन्हें कहावतों की तरह बोलते हैं।" बहुत-से लोग ये पंक्तियाँ बोलते हैं, और उन्हें पता भी नहीं होता कि ये किसी कवि की हैं! किसी रचना की सबसे बड़ी सफलता यही है: जब वह भाषा का हिस्सा बन जाए।
उनकी कविताओं के विषय बहुत साधारण और काम के हैं: उन्होंने लाठी जैसी चीज़ के उपयोग भी बताए, और यह भी कि धन ज़्यादा हो जाए तो क्या करना चाहिए। न राजा-रानी, न युद्ध; वही जो सबके जीवन में काम आए।
वे लोकनीति (लोगों में चलने वाले व्यवहार के नियम) और घर-गृहस्थी की साधारण बातें सीधे-सरल शब्दों में कहने के लिए जाने जाते हैं। सरल शब्द ही वह कारण है जिससे उनकी पंक्तियाँ आज तक याद हैं।
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