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गिरिधर कविराय की कुंडलिया

पंक्तियों का मिलान

कुंडलियों की पंक्तियों को उनके सही जोड़े से मिलाइए।

पृष्ठ 76 पर 'मिलकर करें मिलान' में कुंडलियों की चार जोड़ी पंक्तियाँ और उनके अर्थ हैं:

पंक्तियाँअर्थ
"जग में होत हँसाय चित्त में चैन न पावै। खान पान सन्मान राग रंग मनहिं न भावै॥"बिना सोचे किए काम से मन अशांत रहता है; अच्छा खाना, सम्मान या खुशियाँ भी सुख नहीं देतीं
"कह गिरिधर कविराय दुख कछु टरत न टारे। खटकत है जिय माहिं कियो जो बिना बिचारे॥"बिना सोचे किया काम लंबे समय तक मन में खटकता है; उसकी पीड़ा से छुटकारा मुश्किल है
पंक्तियाँअर्थ
"ताही में चित देइ बात जोई बनि आवै। दुर्जन हँसै न कोइ चित्त में खता न पावै॥"ऐसे काम करो कि किसी बुरे व्यक्ति को हँसने का मौक़ा न मिले, और मन में कोई दोष या अपराधबोध न हो
"कह गिरिधर कविराय यहै करु मन परतीती। आगे को सुख होइ समुझि बीती सो बीती॥"मन को विश्वास कराओ: भविष्य के सुख के लिए बीते दुखों को भुलाकर आगे बढ़ना चाहिए

चारों अर्थ साथ पढ़िए: पहली दो जोड़ियाँ बताती हैं कि बिना सोचे काम करने से क्या होता है; बाद की दो बताती हैं कि उससे कैसे बचें।

यानी पहली कुंडलिया रोग बताती है, दूसरी दवा! और दोनों का केंद्र एक ही है: मन। पहली में मन अशांत रहता है; दूसरी में मन को विश्वास कराया जाता है।

पहली कुंडलिया बताती है कि बिना सोचे करने से क्या होता है, दूसरी बताती है कि उससे बचें कैसे।

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