वर्षा-बहार
ग्रीष्म
मुकुटधर पाण्डेय की एक और कविता 'ग्रीष्म' पढ़िए।
पृष्ठ 94 पर 'झरोखे से' में मुकुटधर पाण्डेय की ही एक और कविता 'ग्रीष्म' का अंश है, और यह 'वर्षा-बहार' का बिलकुल उलटा चित्र है!
"बीते दिवस बसंत के, लगा ज्येष्ठ का मास। विश्व व्यथित करने लगा, रवि किरणों का त्रास।" (ज्येष्ठ = जेठ, भीषण गर्मी का महीना; व्यथित = दुखी; रवि = सूर्य; त्रास = कष्ट।) वसंत गया, जेठ आया, और सूरज की किरणें दुनिया को सताने लगीं।
"अवनि आतप से लगी, जलने सब ही हाल। जीव, जंतु चर-अचर सब, हुए अमिल बेहाल।" (अवनि = पृथ्वी; आतप = धूप की गर्मी; चर = चलने वाले, यानी पशु-पक्षी; अचर = न चलने वाले, यानी पेड़-पौधे।) सब बेहाल!
"रवि मयूख के ताप से, झुलस गए बन बाग। सूखे सरिता सर तथा नाले, कूप तड़ाग।" (मयूख = किरण; सरिता = नदी; सर, तड़ाग = तालाब; कूप = कुआँ।) बाग़ झुलस गए, नदी-तालाब-कुएँ सूख गए।
"लगी आग पुर ग्राम में, चिंता बढ़ी अपार। नर-नारी व्याकुल बसे, भय सदैव उर धार।" (पुर = नगर; ग्राम = गाँव; अपार = बहुत ज़्यादा; व्याकुल = बेचैन; उर = हृदय।)
अब दोनों कविताएँ साथ रखिए:
| 'वर्षा-बहार' | 'ग्रीष्म' |
|---|---|
| तालाब के जीव प्रसन्न | सर और तड़ाग सूखे |
| बागों में आमोद | बन-बाग झुलसे |
| मालिनें और किसान गाते | नर-नारी व्याकुल |
एक ही कवि, एक जैसी भाषा, और दो बिलकुल उलटे चित्र! इससे साबित होता है कि "सारे जगत की शोभा, निर्भर है इसके ऊपर" कोई बढ़ा-चढ़ाकर कही बात नहीं थी। वर्षा न हो तो क्या होता है, यह दूसरी कविता बता देती है।
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