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बिरजू महाराज से साक्षात्कार

लोक और शास्त्रीय नृत्य

लोक नृत्य और शास्त्रीय नृत्य का अंतर समझिए।

माणिक का प्रश्न: "शास्त्रीय नृत्य और लोक नृत्य में क्या अंतर है?"

लोक नृत्यशास्त्रीय नृत्य
कितने लोगसामूहिक (बहुत लोग साथ)एक नर्तक अकेला ही काफ़ी
किसके लिएनाचने वालों के अपने मन बहलाव और संतुष्टि के लिएदर्शकों के लिए
कबदिनभर की मेहनत के बाद, थकान दूर करने कोमंच पर, प्रस्तुति के रूप में

शास्त्रीय नृत्य में एक ही नर्तक सब पात्र निभा लेता है: राधा का नाचना भी, और कृष्ण का घड़ा फोड़ना भी!

ज़रूरी बात: "शुरू में कथावाचक भी लोक नर्तक हुआ करता था। धीरे-धीरे जब उसकी ख़ास शैली व रूप निश्चित होता गया, तो वह शास्त्रीय नृत्य हो गया।" यानी शास्त्रीय नृत्य लोक नृत्य से ही निकला है; बस उसके नियम पक्के हो गए। दोनों की जड़ एक है।

तनुश्री पूछती है: क्या कर्नाटक और हिंदुस्तानी संगीत की तरह दक्षिण और उत्तर के नृत्य में भी अंतर है? शास्त्रीय नृत्य की प्रमुख शैलियाँ: कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, कथकली, मोहिनीअट्टम, ओडिसी, मणिपुरी। हर नृत्य की अपनी लय और भाव-भंगिमा है।

नृत्यख़ास बात
कथकभाव-भंगिमा दैनिक जीवन से; दोनों भाव बारी-बारी से; कोमलता और ओज दोनों
भरतनाट्यमभाव-भंगिमा मूर्तिकला (पुरानी मूर्तियों की मुद्राओं) से; दोनों भाव एक साथ
ओडिसी, मणिपुरीकोमलता
कथकलीओज (तेज़ी और शक्ति)

कथक की बारीकी: गर्दन हल्के से, चिराग की लौ के समान हिलाई जाती है। उँगलियाँ भी बहुत धीरे-से, जैसे घूँघट उठाते समय। उँगलियाँ ज़रा ज़ोर से हिलीं, तो चाचा जी तुरंत टोकते: "घूँघट उठा रहे हो या तंबू?"

लोक नृत्य सामूहिक है और अपने लिए, शास्त्रीय नृत्य अकेले का है और दर्शकों के लिए — पर दोनों की जड़ एक ही है।

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