बिरजू महाराज से साक्षात्कार
मंच से पहले
जानिए कि बिरजू महाराज के समय से अब तक कथक की दुनिया कैसे बदली है।
माणिक का प्रश्न: "आपने जब सीखना शुरू किया था, तब से अब तक कथक की दुनिया में क्या-क्या बदलाव आए हैं?"
| पहले | अब |
|---|---|
| मंच नहीं होते थे | मंच (स्टेज) पर नृत्य |
| फ़र्श पर चाँदनी (बिछाने की बड़ी सफ़ेद चादर) | ऊँचा मंच |
| दर्शक चारों ओर बैठते थे | दर्शक सामने बैठते हैं |
| शृंगार: चंदन-लेप; होंठ रंगने को पान | मेकअप का सामान |
चाँदनी पर नर्तक दर्शकों के बराबर होता था और हर दिशा से देखा जाता था। और मेकअप? वही, जो घर में मिल जाए!
दूसरा बदलाव वर्णन का है। पहले नर्तक दृश्य का ऐसा विस्तृत वर्णन करते थे कि दर्शक के सामने पूरा दृश्य खिंच जाता था:
- गोपियों ने घड़ा उठाया
- धीमी चाल से पनघट की ओर चलीं (पनघट = पानी भरने का घाट)
- पीछे से कृष्ण चुपचाप आए
- कंकड़ उठाया और दे मारा!
"अब सिर्फ़ 'पनघट की गत देखो' कहकर बाकी दर्शक की कल्पना पर छोड़ दिया जाता है।" (गत = कथक में एक ख़ास प्रस्तुति।) अब दृश्य को दर्शक ख़ुद पूरा करता है।
फिर श्रेया पूछती है: "आपने गाना, बजाना और नाचना कब शुरू किया?"
- बहुत छुटपन से ही तबला पीटना शुरू कर दिया
- चाचा ने कहा: "लड़के के हाथ में लय है।"
- पाँच साल का होते-होते हारमोनियम पर लहरा बजाने लगे
- सबको ख़ुश करने के लिए फ़िल्मी गाने भी ख़ूब गाते थे
और एक मज़ेदार याद: एक बार सबकी फ़रमाइश पर सुरैया के एक गाने पर देर तक नाचे। बहनों ने बड़े शौक़ से बिंदी-चुन्नी से सजा दिया था। तब तक चाचा आ गए! "बस डर के मारे तुरंत सब कुछ उतार फेंका और छिप गया।" इतने बड़े कलाकार भी बचपन में ऐसे ही शरारती बच्चे थे!
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