बिरजू महाराज से साक्षात्कार
परंपरा और परिवर्तन
पढ़िए कि बिरजू महाराज ने परंपरा को बनाए रखते हुए कथक में क्या नया जोड़ा।
तनुश्री का प्रश्न: "आपने कथक में कई नई चीज़ें भी जोड़ी हैं न?"
पहला ही वाक्य उनकी पूरी सोच बताता है: "कथक की पुरानी परंपरा को तो क़ायम रखा है। हाँ, उसके प्रस्तुतीकरण में बदलाव किए हैं।" (प्रस्तुतीकरण = दिखाने का ढंग, प्रेज़ेंटेशन।) परंपरा वही, दिखाने का ढंग नया।
क्या बदला?
- चाचा लोग और बाबूजी नाचते तो सुंदर थे ही, उनके खड़े होने का अंदाज़ भी निराला था। उन भाव-भंगिमाओं को भी कथक में शामिल कर लिया। (भाव-भंगिमा = चेहरे और शरीर से प्रकट होने वाले भाव।)
- "चाचा लोग और बाबूजी हमारे लिए ब्रह्मा, विष्णु, महेश थे।" यानी तीनों गुरु ही उनके कलाकार को रचने वाले थे। तीनों की शिक्षा मिलाकर एक नया रूप बनाया।
- टैगोर, त्यागराज आदि कवियों की रचनाओं पर भी कथक रचनाएँ बनाईं।
तनुश्री टोकती है: "पर ये लोग तो अलग-अलग भाषाओं के कवि थे।" बिलकुल! रवींद्रनाथ टैगोर बांग्ला में लिखते थे और त्यागराज तेलुगु में (कर्नाटक संगीत के महान रचनाकार)।
उत्तर, जो पाठ का सबसे बड़ा विचार है: "भाषाएँ अलग-अलग होती हैं पर इंसान तो सब जगह एक-से होते हैं।"
फ्रांस में एक दर्शक ने कहा: "मैं नहीं जानता कि यशोदा कौन है?" उन्होंने बताया: "इस धरती पर सब माँएँ यशोदा हैं और सब नन्हें बच्चे कृष्ण। बच्चे की ज़िद, रोना, उठना, बैठना, सब जगह एक जैसा होता है।" भाषा न समझें, तब भी भाव समझ में आ जाते हैं!
अंत में वृक्ष का रूपक:
- परंपरा एक वृक्ष है, जो सबको एक जैसी छाया देती है; नीचे बैठने वाले अलग-अलग स्वभाव के होते हैं।
- उसका बीज बोओ, तो समय आने पर एक और वृक्ष फलेगा।
- नया वृक्ष कैसा होगा, यह इस पर निर्भर है कि उसे कैसी हवा, पानी और खाद मिली।
यानी शिष्य वही बीज लेता है, पर मन लगाकर सीखे तो अपने गुरुओं से भी बड़ा हो सकता है, जैसे बिरजू महाराज का नाम अपने गुरुओं से भी बड़ा हुआ।
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