स्वदेश
कविता का पहला भाग
'सनेही' जी की कविता 'स्वदेश' का पहला भाग पढ़िए और जानिए कि कवि हमें किस बात के लिए पुकारते हैं।
पहला पाठ. 'मल्हार' का पहला पाठ गयाप्रसाद शुक्ल 'सनेही' की कविता 'स्वदेश' है। यह एक आह्वान गीत है, यानी ऐसी कविता जो पढ़ने वाले को पुकारती है और कुछ करने के लिए प्रेरित करती है।
पहली पंक्ति. "वह हृदय नहीं है पत्थर है, जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं।" कवि यह नहीं कहता कि ऐसा हृदय बुरा है। वह कहता है कि वह हृदय ही नहीं, पत्थर है।
टेक. यही पंक्ति कविता में बार-बार लौटती है। ऐसी लौटने वाली पंक्ति को 'टेक' कहते हैं। गीत में टेक को सब लोग मिलकर गाते हैं।
कवि की कसौटियाँ (परखने की बातें):
- "जो जीवित जोश जगा न सका, उस जीवन में कुछ सार नहीं।" जो अपने और दूसरों के भीतर उत्साह न जगा सके, उसके जीवन में कुछ सार (मूल बात) नहीं।
- "जो चल न सका संसार-संग, उसका होता संसार नहीं॥" जो समाज के साथ मिलकर नहीं चलता, उसका अपना संसार नहीं बनता। जैसे, पास में कोई दुखी हो और हम उसकी मदद न करें।
- "जिसने साहस को छोड़ दिया, वह पहुँच सकेगा पार नहीं।" साहस छोड़ने वाला लक्ष्य तक नहीं पहुँचता। ध्यान दीजिए: बात हारने की नहीं, साहस छोड़ देने की है।
- "जिससे न जाति-उद्धार हुआ, होगा उसका उद्धार नहीं॥" यहाँ 'जाति' का अर्थ है अपना समाज, अपने लोग। जो अपने लोगों को ऊपर न उठा सका, वह खुद भी ऊपर नहीं उठेगा।
- "जो भरा नहीं है भावों से, बहती जिसमें रस-धार नहीं।" जिसके मन में भाव (प्रेम, अपनापन, दया) नहीं, उसमें रस की धारा नहीं बहती।
और फिर वही टेक लौटती है।
ध्यान दीजिए: कविता कठोर बात (पत्थर) से शुरू होती है, और अंत में कोमल बात (भावों से भरा मन) पर लौटती है।
Practise this lesson
Questions that get harder as you improve, a Tutor that helps without giving the answer away, and progress you can see. Free for every learner.
No account, no email address. Opens the real product.