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स्वदेश

कविता का दूसरा भाग

कविता का दूसरा भाग पढ़िए और देखिए कि हमारा देश हमें क्या-क्या देता है।

देश हमें क्या देता है. कविता का दूसरा भाग गिनाता है कि हमें देश से क्या-क्या मिला है।

"जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े, पाया जिसमें दाना-पानी। हैं माता-पिता बंधु जिसमें, हम हैं जिसके राजा-रानी॥"

  • मिट्टी, जिसमें हम पले-बढ़े;
  • दाना-पानी (अन्न और जल);
  • माता-पिता और बंधु (परिवार);
  • और सबसे बड़ी बात: हम ही इस देश के राजा-रानी हैं।

'हम' कौन? यहाँ 'हम' का अर्थ है देश के सभी नागरिक। कवि यह नहीं कह रहा कि देश पर कोई राजा राज करता है। वह कह रहा है कि देश हमारा है, तो उसकी देखभाल भी हमारी ज़िम्मेदारी है।

"जिसने कि खजाने खोले हैं, नव रत्न दिये हैं लासानी।" 'लासानी' का अर्थ है अनुपम, जिसके जैसा कोई दूसरा न हो।

ये खजाने केवल सोने-चाँदी के नहीं, ज्ञान के खजाने हैं। अगली पंक्ति यही बताती है: "जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं, जिस पर है दुनिया दीवानी॥" ज्ञानी लोग धन पर नहीं, ज्ञान पर मरते हैं।

"उस पर है नहीं पसीजा जो, क्या है वह भू का भार नहीं।" 'पसीजना' यानी मन का पिघलना, द्रवित होना। जिसका मन इतना कुछ पाकर भी न पिघले, वह धरती पर बोझ ही है।

मृत्यु की याद. "निश्चित है निस्संशय निश्चित, है जान एक दिन जाने को। है काल-दीप जलता हरदम, जल जाना है परवानों को॥" मृत्यु निश्चित है। तो क्यों न जीवन किसी बड़े काम के लिए लगाया जाए?

अंत. "सब कुछ है अपने हाथों में, क्या तोप नहीं तलवार नहीं।" जो चाहिए, वह हमारे भीतर है: साहस और इच्छाशक्ति। हथियारों की बात नहीं। और कविता फिर अपनी टेक पर लौट आती है।

'हम हैं जिसके राजा-रानी': देश किसी एक का नहीं, सब नागरिकों का है।

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