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तरुण के स्वप्न

स्वप्न का उपहार

भाषण का अंतिम भाग पढ़िए, जो सबसे ऊँचे स्वर में कहा गया है।

भाषण का आख़िरी भाग सबसे ऊँचे स्वर में है।

राष्ट्र क्या है? "जो राष्ट्र हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा…" यहाँ यंत्र = साधन (औज़ार)। राष्ट्र समाज का मालिक नहीं, उसकी सेवा का साधन है। यही क्रम पूरे भाषण में है।

वह राष्ट्र कहाँ तक जाएगा? वह केवल भारतवासियों का अभाव मिटाकर नहीं रुकेगा, "बल्कि विश्व-मानव के समक्ष आदर्श-समाज और आदर्श-राष्ट्र के रूप में गण्य होगा।" गण्य = गिना जाने योग्य, माना जाने वाला। दुनिया उसे मिसाल मानेगी।

सपना अब सत्य है: "यह स्वप्न मेरे समक्ष नित्य एवं अखंड सत्य है।" नित्य = हर दिन का; अखंड = जो कभी न टूटे।

इस सत्य के लिए वे क्या देंगे?

  • "हर प्रकार का त्याग किया जा सकता है";
  • "हर संकट को सहा जा सकता है";
  • और "प्राण देना भी है तो 'वह मरण है स्वर्ग समान'।"

फिर स्वर बदलता है: "हे मेरे तरुण भाइयो! तुम्हें देने लायक मेरे पास कुछ भी नहीं है।" वे कोई पद, धन या इनाम नहीं दे रहे। "है सिर्फ यही स्वप्न जो हमें असीम शक्ति और अपार आनंद देता है, जो मेरे क्षुद्र जीवन को भी सार्थक बनाता है।"

'क्षुद्र' = छोटा। इतना बड़ा नेता अपने ही जीवन को छोटा कहता है।

अंतिम वाक्य: "यह स्वप्न मैं तुम्हें उपहारस्वरूप देता हूँ— स्वीकार करो।" भाषण किसी आदेश से नहीं, एक विनती से खत्म होता है।

"तुम्हें देने लायक मेरे पास कुछ भी नहीं है, है सिर्फ यही स्वप्न।"

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