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दो गौरैया

घर के असली मालिक

भीष्म साहनी की कहानी 'दो गौरैया' शुरू कीजिए और जानिए कि घर के असली मालिक कौन हैं।

कहानी की शुरुआत. 'दो गौरैया' भीष्म साहनी की कहानी है। यह घर के लोगों की गिनती से शुरू होती है: "घर में हम तीन ही व्यक्ति रहते हैं— माँ, पिताजी और मैं।"

पर अगला वाक्य इसे पलट देता है: "पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं।"

सराय वह जगह है जहाँ यात्री थोड़ी देर ठहरते हैं और चले जाते हैं। पिताजी की शिकायत यही है कि उनके घर में भी सब आते-जाते रहते हैं। यही बात पूरी कहानी की जड़ है।

आँगन का पेड़. आँगन में आम का पेड़ है, और उस पर तरह-तरह के पक्षी डेरा डाले रहते हैं। पिताजी कहते हैं कि जो भी पक्षी पहाड़ों से उड़कर दिल्ली पहुँचता है, वह सीधा उनके घर आता है, "जैसे हमारे घर का पता लिखवाकर लाया हो"।

यह बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात है। लेखक ने जान-बूझकर ऐसा लिखा है, इसी से कहानी में हँसी आती है।

घर के अंदर. बीसियों चूहे रात-भर भागते फिरते हैं: बर्तन गिरते हैं, डिब्बे खुलते हैं, प्याले टूटते हैं।

दो खास चूहे:

  • एक अँगीठी के पीछे बैठता है: "शायद बूढ़ा है, उसे सर्दी बहुत लगती है।"
  • दूसरा बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठता है: "उसे शायद गरमी बहुत लगती है।"

और प्राणी:

  • बिल्ली घर में रहती नहीं, पर कभी-कभी झाँक जाती है; मन न हो तो 'फिर आऊँगी' कहकर चली जाती है;
  • शाम को चमगादड़ कमरों में उड़कर 'कसरत' करते हैं;
  • कबूतर दिन-भर गुटरगूँ का 'संगीत' सुनाते हैं;
  • छिपकलियाँ, बर्रे (ततैया), और चींटियों की फ़ौज छावनी डाले रहती है।

ध्यान दीजिए: लेखक इन प्राणियों का वर्णन ऐसे करता है जैसे वे मनुष्य हों। यही ढंग पूरी कहानी में चलता है।

'यह घर सराय बना हुआ है': पिताजी की यही शिकायत पूरी कहानी की जड़ है।

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