दो गौरैया
पिताजी का युद्ध
पढ़िए कि पिताजी ने दो छोटी चिड़ियों से कैसा युद्ध छेड़ा।
युद्ध शुरू. एक ओर पिताजी, दूसरी ओर दो छोटी चिड़ियाँ। माँ बीच में बैठी हँसती रहती हैं।
पिताजी: "देखता हूँ ये कैसे यहाँ रहती हैं! गौरैयाँ मेरे आगे क्या चीज़ हैं! मैं अभी निकाल बाहर करता हूँ!"
माँ: "छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" यह व्यंग्य है: सीधे न कहकर उलटे ढंग से कही गई बात। इसी पर पिताजी को और गुस्सा आया।
पिताजी का प्रदर्शन: ताली बजाई, 'श…शू' किया, बाँहें झुलाईं, खड़े-खड़े कूदने लगे। गौरैयों ने घोंसले से झाँककर देखा और 'चीं-चीं' करने लगीं।
माँ की सबसे मशहूर टिप्पणी: "चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?" एक ही वाक्य में पिताजी का सारा पराक्रम नाच बन गया।
लाठी और दरवाज़े. फिर पिताजी लाठी ले आए। माँ ने हँसकर कहा: "इतनी तकलीफ़ करने की क्या ज़रूरत थी। पंखा चला देते, तो ये उड़ जातीं।" फिर माँ की सलाह पर एक दरवाज़ा खुला छोड़ा गया, बाकी बंद। गौरैयाँ उसी से निकल गईं।
पिताजी ने लाठी दीवार से टिका दी और छाती फैलाए (गर्व से) कुर्सी पर बैठ गए: "आज दरवाज़े बंद रखो।"
वे फिर लौट आईं:
- पहले दरवाज़ों के नीचे की खाली जगह से। पिताजी ने वहाँ कपड़े ठूँस दिए।
- फिर टूटे शीशे वाले रोशनदान से। पिताजी ने कुर्सी पर चढ़कर रोशनदान में भी कपड़ा ठूँस दिया।
माँ का स्वर बदला. अब तक माँ हँस रही थीं; अब गंभीर होकर बोलीं: "देखो-जी, चिड़ियों को मत निकालो। अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे।" पिताजी: "क्या मतलब? मैं कालीन बरबाद करवा लूँ?" यानी उनकी आपत्ति थी कि चिड़ियाँ गंदगी करेंगी।
पिताजी की नज़र में: "माँ मदद तो करती नहीं, बैठी हँसे जा रही थीं।" सलाह देने के सिवा माँ ने गौरैयाँ निकालने में हाथ नहीं बँटाया, और यही बात पिताजी को और चिढ़ाती थी।
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