दो गौरैया
घोंसला और चीं-चीं
गौरैयों के घोंसले और उनकी चीं-चीं के साथ कहानी का अगला हिस्सा पढ़िए।
हर रोज़ यही. अगला दिन इतवार था, और गौरैयाँ फिर मौजूद थीं: "मज़े से बैठी मल्हार गा रही थीं।" ('मल्हार' वर्षा ऋतु का राग है; इसी नाम पर आपकी यह पुस्तक है।)
अब रोज़ यही होता: दिन में वे बाहर निकाल दी जातीं, रात को न जाने किस रास्ते से लौट आतीं।
पिताजी बार-बार कहते: "मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हूँ।" पर आखिर उनकी सहनशीलता चुक गई, और उन्होंने सबसे कठोर फ़ैसला किया: घोंसला ही तोड़ देंगे।
स्टूल पर चढ़कर उन्होंने कहा: "किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए।" यह कहानी का सबसे कठोर वाक्य है।
लाठी से दो तिनके गिरे, तो माँ हँसकर बोलीं: "अब बाकी दो हज़ार भी निकल जाएँगे!" (दो तिनके निकले, दो हज़ार बाकी!)
बाहर का दृश्य. लेखक ने बाहर देखा: दोनों गौरैयाँ दीवार पर चुपचाप बैठी थीं। "कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं। अब वे चहक भी नहीं रही थीं।"
गाना बंद हो जाना ही बता देता है कि उन पर क्या बीत रही थी। वे अंडों पर बैठती थीं और बार-बार निकाली जा रही थीं।
वह आवाज़. पिताजी लाठी घुमाते रहे, घोंसले के तिनके लाठी पर लिपटते गए। तभी: "चीं-चीं, चीं-चीं!!" पिताजी के हाथ ठिठक गए (रुक गए)।
घोंसले से नन्हीं-नन्हीं गौरैयाँ झाँक रही थीं, "मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं। हमारे माँ-बाप कहाँ हैं?"
अंत. पिताजी चुपचाप उतरे, लाठी एक ओर रख दी, कुर्सी पर बैठ गए। उन्होंने कुछ कहा नहीं। माँ ने सभी दरवाज़े खोल दिए। माँ-बाप गौरैयाँ उड़कर आईं और बच्चों की चोंचों में चुग्गा डालने लगीं।
"कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे।"
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