दो गौरैया
वाक्यों के अर्थ और सोच-विचार
कहानी के कुछ वाक्यों के सही अर्थ पहचानिए और उन पर सोचिए।
सही अर्थ चुनिए. कहानी के सात वाक्य हैं, हर एक के दो अर्थ। दोनों पहली नज़र में ठीक लगते हैं, इसलिए ध्यान से पढ़िए।
1. 'वह शोर मचता है कि कानों के पर्दे फट जाएँ, पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं!' → पिताजी को वह शोर लगता था, पर लोगों को संगीत। एक ही आवाज़ के दो अलग अनुभव। (जैसी सुनने वाले की मनःस्थिति, वैसी आवाज़।)
3. 'वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते।' → चूहों के शोर से घर के लोग नहीं सो पाते। (चूहे नहीं सो पाते, यह उलटा अर्थ है।)
5. 'पिताजी ने लाठी दीवार के साथ टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुर्सी पर आ बैठे।' → विजयी मुद्रा में, गर्व से बैठे। 'छाती फैलाना' थकान का नहीं, गर्व का चिह्न है।
6. 'इतने में रात पड़ गई।' → 'रात पड़ना' मुहावरा है: रात हो जाना। (रात गिर पड़ी, यह अर्थ नहीं।)
7. 'वे मज़े से बैठी मल्हार गा रही थीं।' → वे शांत और प्रसन्न होकर चहचहा रही थीं। गौरैयाँ सचमुच राग नहीं गातीं; लेखक ने उनके चहचहाने को राग कह दिया।
तीन पंक्तियों पर सोचिए:
- 'अब तो ये नहीं उड़ेंगी… अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है।' माँ बता रही हैं कि घर बना लेने के बाद कोई जगह नहीं छोड़ता।
- 'एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देंगी।' यह पिताजी का अनुमान है, जो गलत निकला।
- 'किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए।' सबसे कठोर वाक्य; और इसके कुछ ही पल बाद पिताजी का मन बदल जाता है।
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