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एक आशीर्वाद

कविता

दुष्यंत कुमार की छोटी-सी कविता 'एक आशीर्वाद' पढ़िए।

छोटी कविता, बड़ी बात. दुष्यंत कुमार की यह कविता बहुत छोटी है, केवल चौदह पंक्तियाँ। और यह एक ही शब्द से शुरू होती है: "जा,"

यह शब्द विदा करने का है। कोई बड़ा किसी छोटे को भेज रहा है, और साथ में एक कामना दे रहा है: "तेरे स्वप्न बड़े हों।"

ध्यान दीजिए: कवि यह नहीं कहता कि 'तू बड़ा हो'। वह कहता है 'तेरे स्वप्न बड़े हों'। पूरी कविता में सपनों को ऐसे दिखाया गया है जैसे वे कोई बच्चा हों, जो बड़ा हो रहा है।

गोद से धरती पर. "भावना की गोद से उतरकर / जल्द पृथ्वी पर चलना सीखें"। जैसे बच्चा माँ की गोद से उतरकर चलना सीखता है, वैसे ही सपने भी भावना की गोद से उतरकर धरती पर चलें। गोद नरम है, धरती कठोर। यानी सपने केवल मन में न रहें, उन पर काम भी हो।

ज़िद. "चाँद-तारों-सी अप्राप्य सच्चाइयों के लिए / रूठना-मचलना सीखें"। अप्राप्य = जो पाया न जा सके। बच्चा कोई चीज़ चाहता है तो रूठता है, मचलता है, हार नहीं मानता। कवि चाहता है कि सपने भी उन लक्ष्यों के लिए ऐसे ही ज़िद करें जो चाँद-तारों जैसे असंभव लगते हैं।

आनंद. "हँसें / मुसकराएँ / गाएँ"। तीन छोटी पंक्तियाँ, तीन क्रियाएँ। सपनों में मेहनत के साथ खुशी भी हो।

ललक. "हर दीये की रोशनी देखकर ललचाएँ / उँगली जलाएँ"। बच्चा दीये की लौ देखकर उसे छूना चाहता है, और उँगली जला भी लेता है। कवि यह भी चाहता है! यानी जिज्ञासा इतनी हो कि चोट लगने का डर न रोके।

अंत. "अपने पाँवों पर खड़े हों।" फिर वही पहली पंक्ति: "जा, / तेरे स्वप्न बड़े हों।" कविता जहाँ से शुरू हुई थी, वहीं लौट आई।

कवि यह नहीं कहता कि 'तू बड़ा हो'; वह कहता है 'तेरे स्वप्न बड़े हों'।

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